महुआ: पोषण और औषधि का खजाना होने के बाद भी सरकारी उपेक्षा का शिकार, प्रक्रिया उद्योग के अभाव में शराब तक सीमित
पूर्वी विदर्भ में महुआ के फूल किसानों के लिए वरदान हैं, लेकिन सरकारी उपेक्षा और प्रक्रिया उद्योग न होने से इसका 90% उपयोग केवल शराब के लिए हो रहा है।
Gondia Mahua Flower News: गोंदिया पूर्वी विदर्भ में पाए जाने वाला महुआ (Madhuca longifolia) किसानों और आदिवासी समुदाय के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, लेकिन सरकारी स्तर पर इसकी लगातार अनदेखी चिंता का विषय बनी हुई है। पोषण, औषधि और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद महुआ आज भी मुख्यतः शराब उत्पादन तक सीमित होकर रह गया है।
पूर्वी विदर्भ के गोंदिया, भंडारा, गढ़चिरोली और चंद्रपुर जिलों में महुआ के पेड़ बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। एक पेड़ से औसतन 50 किलो तक फूल प्राप्त होते हैं, जो बाजार में 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं। अकेले गोंदिया जिले में ही लगभग 100 टन उत्पादन होता है, जिससे लाखों रुपये का कारोबार संभव है। इसके बावजूद इस पर आधारित कोई संगठित प्रक्रिया उद्योग विकसित नहीं हो सका है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के सीमित साधनों के कारण कई परिवार, विशेषकर महिलाएं, महुआ फूल से शराब बनाने के व्यवसाय में जुड़ी हुई हैं। यह मजबूरी का रोजगार है, न कि विकल्प। यदि महुआ आधारित वैल्यू एडिशन उद्योग विकसित किए जाएं, तो इन परिवारों को सम्मानजनक और स्थायी आय का स्रोत मिल सकता है। महुआ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पेड़ों की देखभाल में लगभग कोई लागत नहीं आती।
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इसके फूलों से सब्जी, सिरप और औषधीय उत्पाद बनाए जाते हैं, जबकि बीज से निकला तेल भोजन और पारंपरिक दवाओं में उपयोग होता है। इसके अलावा पत्तों से पत्तल, फूलों से पशु चारा, खाद्य उत्पाद, सौंदर्य प्रसाधन और यहां तक कि बायोडीजल भी तैयार किया जा सकता है। पोषण के दृष्टिकोण से भी महुआ अत्यंत समृद्ध है। प्रति 100 ग्राम में इसमें विटामिन C, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और पर्याप्त खनिज तत्व पाए जाते हैं, जो इसे एक प्राकृतिक “सुपरफूड” बनाते हैं।
राज्य सरकार द्वारा महाराष्ट्र शराब निषेध अधिनियम 1949 के तहत महुआ के संग्रहण और परिवहन पर लगी पाबंदियों को हटाया गया है। इस निर्णय का उद्देश्य किसानों और छोटे उत्पादकों को राहत देना था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका लाभ कितनी हद तक पहुंचा है, यह अभी भी सवालों के घेरे में है।
इतने बहुआयामी उपयोग और आर्थिक क्षमता के बावजूद महुआ को उचित संरक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। यदि सरकार इस “वन संपदा” को प्राथमिकता दे, तो यह न केवल राजस्व बढ़ाने में सहायक होगा बल्कि आदिवासी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकता है।
