गोरेगांव में बफर जोन के कारण चराई पर रोक, गांवों में घटा पशुधन; किसानों की आय और बाजार समिति राजस्व प्रभावित
गोरेगांव में कई गांवों को बफर जोन घोषित करने और चराई पर रोक लगाने से पशुधन की संख्या में 10,000 से अधिक की कमी आई है। इससे किसानों की आय और बाजार समिति का राजस्व प्रभावित हुआ है।
Goregaon Forest Range News: गोरेगांव वनपरिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले गांवों के किसान खेती के साथ-साथ परंपरागत रुप से गौपालन भी करते हैं। गोधन गाय-भैंस की खरीद-फरोख्त से किसानों की आय बढ़ती थी और कृषि उत्पन्न बाजार समिति को भी अच्छा खासा राजस्व प्राप्त होता था, लेकिन चराई पर प्रतिबंध से वनक्षेत्र के गांवों में पालतू पशुओं की संख्या में गिरावट आई है। वन्यजीव संरक्षण व वन क्षेत्र सुरक्षा बढ़ाने के लिए सरकार ने तहसील के अनेक गांवों को बफर जोन घोषित कर दिया है।
इसके बाद इन क्षेत्रों में गोधन की चराई पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे पशुधन की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। पशुधन विकास विभाग के अनुसार अन्य गांवों के पशुपालकों द्वारा भी गोधन की संख्या कम किए जाने से हालात और बुरे होते जा रहे हैं। पहले इन गांवों में चारे की उपलब्धता अधिक होने के कारण बड़े पैमाने पर गोधन पाला जाता था।
पशुपालक बड़ी संख्या में गाय-भैंस खरीदते-बेचते थे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती थी। बाजार समिति को भी गोधन व्यापार के कारण भरपूर आय मिलती थी। लेकिन अब चराई पर प्रतिबंध से गोधन की संख्या तेजी से घट रही है। बाजार समिति की आय में बड़ी कमी आई है और पशुपालक भी संकट में फंस गए हैं।
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भविष्य में गोधन की उपलब्धता ही समस्या बन सकती है, ऐसी चिंता किसानों में बढ़ती दिख रही है। किसान अब सरकार से गोधन बढ़ाने के लिए विशेष उपाय योजना करने की मांग कर रहे हैं। इन गांवों को घोषित किया बफर जोन।
गोरेगांव तहसील के सौदला, गोंदी, जांभुलपानी, गराडा, रामाटोला, मलपुरी, बोडुंदा, आलेबेदर, आसलपानी रिठी, निंबा, हलबीटोला निंबा, झालिया रिठी, पिपरटोला तानु, तिल्ली, पलखेडा, मुरदोली, तेलनखेडी, घुमर्रा, पिंडकेपार, पालेवाड़ा, मुंडीपार, हीरापुर, बागडबंध, धानुटोला, लेंडेडारी, गिरोला रिठी, रेंगेपार रिठी आदि गांव सरकार द्वारा आरक्षित/बफर क्षेत्र घोषित किए गए हैं।
इन क्षेत्रों में पालतू पशुओं को वन में चराने पर पूर्ण रोक है। चराई बंद होने से पशुपालकों को पशुओं का पालन-पोषण कठिन होता जा रहा है। कई लोगों ने मजबूरी में गौपालन ही छोड़ दिया है, जिससे इन प्रतिबंधित में अब बहुत कम पशुधन दिखाई देता है। अन्य गांवों के पशुपालक भी चराई की समस्या से जूझ रहे हैं, जिसका सीधा असर गौपालन व्यवसाय पर पड़ रहा है।
समिति की आय भी घटी। गौधन की खरीद-फरोख्त से कृषि उत्पन्न बाजार समिति को पहले पर्याप्त आय मिलती थी, लेकिन पशुधन घटने से व्यापार कम हुआ है और समिति की आय भी घट गई है। आशीष बघेले, सचिव कृषि उत्पन्न बाजार समिति, गोरेगांव।
चराई प्रतिबंध प्रमुख कारण। पांच वर्ष पहले गोरेगांव तहसील में गायों की संख्या 34,249 और भैसों की संख्या 5,575 थी। अब गाएं सिर्फ 24,883 और भैंसे 4,328 ही रह गई हैं, चराई प्रतिबंध इस गिरावट का प्रमुख कारण है। के.एन. भोंडे, पशुधन विकास अधिकारी, गोरेगांव।
