गड़चिरोली में स्टील हब परियोजना पर विवाद, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हजारों किसान आंदोलनरत
Gadchiroli Farmers Movement: गड़चिरोली को स्टील हब बनाने के लिए 27 गांवों की उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण का भारी विरोध। आंदोलन के बाद प्रशासन ने रोक लगाई, पर किसान स्थायी समाधान पर अड़े हैं।
- Written By: केतकी मोडक
गढ़चिरौली किसान आंदोलन (सोर्स - फोटो नवभारत)
Gadchiroli Steel Hub Project: खनिज संपदा से समृद्ध गड़चिरोली जिले को औद्योगिक मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने “स्टील हब” विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। उद्योगों की स्थापना के माध्यम से रोजगार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण ने हजारों किसान परिवारों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। परिणामस्वरूप जिले में विकास बनाम खेती का संघर्ष खुलकर सामने आ गया है।
पिछले सप्ताह हजारों किसान अपने परिवारों के साथ जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने धरने पर बैठे। तेज गर्मी और बारिश की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद किसानों ने भूमि अधिग्रहण का विरोध जारी रखा। आंदोलन की तीव्रता को देखते हुए सरकार को फिलहाल अधिग्रहण प्रक्रिया पर रोक लगानी पड़ी, लेकिन यह केवल अस्थायी राहत मानी जा रही है। इसलिए किसानों की चिंता अभी भी बरकरार है।
हवाई अड्डा, एमआईडीसी और बढ़ती बेचैनी
हिरापुर, गुरुवला, राखी तथा शिरपुरचक क्षेत्र में प्रस्तावित हवाई अड्डे के लिए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा सामने आया है। वहीं भेंडाला क्षेत्र के 14 गांवों ने MIDC परियोजना के लिए जमीन देने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। इसके अलावा जयरामपुर क्षेत्र के 13 गांवों में भी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष बढ़ गया है। किसान संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि उन्हें उद्योगों से कोई विरोध नहीं है।
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वे भी चाहते हैं कि गड़चिरोली जिले में रोजगार के अवसर बढ़ें और विकास हो। लेकिन उनका कहना है कि यह विकास किसानों – की उपजाऊ जमीन छीनकर नहीं होना चाहिए, गड़चिरोली के अधिकांश परिवारों की आजीविका कृषि पर निर्भर है। कई पीढ़ियों से जोत रही जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और जीवन का आधार है। इसलिए केवल आर्थिक मुआवजे के बदले किसान अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
विकास मॉडल पर विवाद
गडचिरोली खनिज संसाधनों से भरपूर जिला है, इसलिए सरकार उद्योगों को आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। लेकिन विकास का मॉडल स्थानीय लोगों के हि
तों के अनुरूप होना चाहिए। यदि औद्योगिकीकरण की कीमत खेती, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़े, तो ऐसे विकास की स्थिरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। औद्योगिकीकरण से रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन जमीन खोने वाले प्रत्येक किसान परिवार को उसका लाभ मिलेगा, इसकी कोई स्पष्ट गारंटी नहीं है, इसलिए विकास के लाभों का समान वितरण भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।
केवल स्थगन मिला, समाधान नहीं
- सरकार ने फिलहाल भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर रोक लगाई है, लेकिन इससे विवाद समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले समय में सरकार और किसानों के बीच संवाद, वैकल्पिक भूमि की तलाश तथा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने के प्रयास ही इस संघर्ष की दिशा तय करेंगे। गडचिरोली को उद्योगों की आवश्यकता है, यह एक वास्तविकता है। लेकिन खेती की बलि देकर विकास का रास्ता चुनना दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जा सकता। उद्योग और कृषि के बीच संतुलन स्थापित करने वाली नीति ही जिले के हित में होगी।
- अन्यथा “स्टील हब” का सपना पूरा करते समय हजारों किसान परिवारों के जीवन पर गहरा असर पड़ने की आशंका बनी रहेगी। भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी गई है, लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक सरकार स्पष्ट रूप से उनकी जमीनों को अधिग्रहण से बाहर नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा, यह मामला अब केवल जमीन का नहीं, बल्कि किसानों के अस्तित्व, आजीविका और भविष्य का प्रश्न बन चुका है।
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वैकल्पिक जमीन का नहीं सुलझ रहा प्रश्न
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा वैकल्पिक भूमि का है। किसानों का दावा है कि जिले में बड़ी मात्रा में झाड़ीदार वन क्षेत्र और कम उपयोग वाली भूमि उपलब्ध है। ऐसे में उद्योगों के लिए उपजाऊ कृषि भूमि का चयन क्यों किया जा रहा है, यह बड़ा सवाल बन गया है।
किसानों का कहना है कि जब वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है, तब खाद्यान्न उत्पादन करने वाली भूमि का अधिग्रहण उचित नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि कृषि भूमि के नुकसान का प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ेगा।
-नवभारत लाइव के लिए गड़चिरोली से सुरेश नगराले की रिपोर्ट
