धुले महानगरपालिका (सोर्स: सोशल मीडिया)
Dhule Religious Polarization: धुले महानगरपालिका चुनाव अभी-अभी संपन्न हुए हैं। नतीजों ने राजनीतिक समीकरण तो साफ कर दिए, लेकिन उससे कहीं ज्यादा साफ तौर पर सामने आया है इस शहर का सामाजिक सच का चिंताजनक चेहरा। हिंदू बहुल इलाकों में भाजपा को और मुस्लिम बहुल इलाकों में एमआईएम को मिली स्पष्ट बहुमत सिर्फ राजनीतिक हकीकत नहीं, बल्कि बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण के भयावह संकेत हैं। राजनीति के नाम पर शहर के हिंदू-मुस्लिम भाईचारे पर प्रहार हो रहा है और कट्टरवाद बेलगाम घूम रहा है, यह कहना गलत नहीं होगा।
धुले शहर दंगों के लिए बदनाम रहा है। हकीकत में दो बार दंगों की आग झेल चुके इस शहर को इतिहास से सबक सीखना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा। उलट, कुछ स्वार्थी राजनीतिक ताकतें जानबूझकर पुरानी जख्मों को कुरेद रही हैं। वोट की फसल काटने के लिए धर्म का इस्तेमाल, समाज में अविश्वास फैलाना और ‘वे’ व ‘हम’ की खाई पैदा करना लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है।
गंभीर बात यह है कि कुछ जिम्मेदार जनप्रतिनिधि खुले आम एक विशेष धर्म के लोगों से खरीदारी न करने की अपील कर रहे हैं। यह सिर्फ सामाजिक बहिष्कार का समर्थन नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर सीधा हमला है। ऐसे बयानों का असर चुनाव नतीजों में साफ दिखता है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक रिश्तों को तोड़ने की यह कोशिश धुले शहर को फिर से हिंसा के मुहाने पर ला खड़ा कर सकती है।
धुले सिर्फ हिंदुओं या मुस्लिमों का शहर नहीं, यह सभी धर्मों, सभी समाजों का साझा घर है। विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर बहस होनी चाहिए थी। लेकिन अफसोस, धर्म आधारित राजनीति ने इन मुद्दों को किनारे कर दिया है। इसकी कीमत पूरे शहर को चुकानी पड़ेगी। अगर वक्त रहते समझदारी नहीं दिखाई गई तो धुले फिर धधकेगा, इसमें जरा भी शक नहीं।
समाज के सजग नागरिकों, धार्मिक नेताओं और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को आगे आकर नफरत की इस राजनीति का विरोध करना चाहिए, वरना इतिहास फिर से खून से सना रूप लेकर खुद को दोहराएगा। चुनाव के बाद शहर में तनाव का माहौल है। हिंदू बहुल वाडों में भाजपा की जीत ने जहां एक पक्ष को मजबूत किया, वहीं मुस्लिम इलाकों में एमआईएम की कामयाबी ने ध्रुवीकरण को और गहरा किया। स्थानीय नेताओं के बयान इस आग में घी डाल रहे है।
भाजपा के कुछ नेता मुस्लिम व्यापारियों का बहिष्कार करने की बात कहते हैं, जबकि एमआईएम के कार्यकर्ता हिंदू-मुस्लिम एकता की दुहाई देते हुए भी धार्मिक लामबंदी कर रहे है। शहर की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ रहा है। बाजारों में अविश्वास बढ़ा है, कारोबार प्रभावित हो रहा है। धुले की मिली-जुली संस्कृति, जहां त्योहार साथ मनाए जाते थे, अब खंडित हो रही है।
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पिछले दंगों की यादें अभी ताजा है। 2008 और 2018 की घटनाएं शहर को सालों पीछे धकेल गई। मौतें, संपत्ति का नुकसान, सामाजिक दरारें-सब कुछ हुआ। लेकिन राजनीतिक पार्टियां इनसे सबक लेने की बजाय इन्हें हथियार बना रही है। सेक्युलर दलों की नाकामी भी साफ है। उन्होंने मुस्लिमों को न्याय नहीं दिया, जिससे एमआईएम जैसी पार्टियां मजबूत हुई। हिंदू वोटों को एकजुट करने में भाजपा कामयाब रही, लेकिन यह जीत शहर की हार है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि ऐसे ध्रुवीकरण से शहर का विकास रुक जाता है। निवेश आना बंद हो जाता है।
शिवसेना यूबीटी के पूर्व विधायक अनिल गोटे ने कहा कि भाजपा और एमआईएम एक ही सिक्के के दो पहलू है। है। ईवीएम में छेड़छाड़ की गई और लोगों को पता न चले इसलिए धनबल का इस्तेमाल हुआ, यह लोकतंत्र के लिए घातक है। दोनों धर्मों के कुछ कट्टरवादियों को हम जरूर कम करेंगे और नफरत की राजनीति को मिट्टी में मिला देंगे,
AIMIM नेता इरशाद जहांगीरदार सेक्युलर पार्टियों ने मुस्लिमों को न्याय नहीं दिया इसलिए उन्हें नकारा गया हिंदू बहुल इलाकों में भाजपा को रोकने में सेक्युलर पार्टियां पूरी तरह फेल रही। एमआईएम को विशिष्ट धर्म की पार्टी बताना गलत प्रचार है। दोनों धर्मों में कोई खाई नहीं है, उसे दूर करने का सवाल ही नहीं उठता।
शिवसेना शिंदे गुट के नेता महेश मिस्त्री ने किहा भाजपा की एमआईएम बी टीम है। भाजपा ने बड़े पैमाने पर फंडिंग की इसलिए उनकी 10 सीटें जीतीं। हिंदू-मुस्लिम में कोई खाई नहीं है, दोनों धर्मों के धर्मयोद्धा चुनाव के वक्त जागते हैं, बाद में गुण्यागोविंद से रहते हैं।
– नवभारत लाइव के लिए धुले से वाहिद काकर की रिपोर्ट