Chandrapur News: RTE नियमों को हाई कोर्ट में चुनौती, सरकार से 9 मार्च तक जवाब तलब
RTE Rule Challenge: महाराष्ट्र में RTE प्रवेश के लिए लागू 1 किलोमीटर की नई शर्त को मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ में चुनौती दी गई है। अदालत ने राज्य सरकार से 9 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है।
- Written By: आंचल लोखंडे
Nagpur High Court RTE Case (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nagpur High Court RTE Case: शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखना अनिवार्य है। हालांकि राज्य सरकार द्वारा हाल ही में किए गए नए बदलावों के कारण कई छात्र RTE के तहत प्रवेश से वंचित रह सकते हैं।
इसी के विरोध में चंद्रपुर जिले के दो नागरिक शंकर आत्राम और करिश्मा बांगडे ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में याचिका दायर की है। राज्य सरकार के इस निर्णय को चुनौती दिए जाने के बाद जिले में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है।जस्टिस अनिल किल्लोर और जस्टिस राज वाकोडे की खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 9 मार्च 2026 तक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
RTE कानून के उद्देश्य में बाधा
महाराष्ट्र सरकार ने 12 फरवरी 2026 को जारी एक सरकारी आदेश में RTE के तहत प्रवेश के लिए नई शर्त लागू की थी। इसके अनुसार, छात्रों के घर से 1 किलोमीटर के दायरे में स्थित स्कूलों में ही प्रवेश देने का प्रावधान किया गया है। इस शर्त को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यह नियम RTE कानून के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
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याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट बोधी रामटेके और एडवोकेट दीपक चटप ने अदालत में पक्ष रखा। याचिकाकर्ता शंकर आत्राम ने कहा कि 1 किलोमीटर की सीमा लागू करने से RTE कानून के उद्देश्य में बाधा उत्पन्न होती है और यह बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार के भी खिलाफ है।
हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान
एडवोकेट दीपक चटप ने बताया कि RTE अधिनियम का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। लेकिन 1 किलोमीटर की शर्त लागू होने से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों के लिए इस योजना का लाभ लेना मुश्किल हो सकता है। हाई कोर्ट ने इस मुद्दे का संज्ञान लिया है।
संविधान के नियमों के खिलाफ: याचिकाकर्ता
एडवोकेट बोधी रामटेके ने कहा कि RTE में किया गया यह नया बदलाव संविधान की भावना के खिलाफ है। यदि अदालत इस फैसले को रद्द करती है, तो यह महाराष्ट्र में पिछड़े वर्ग के हजारों छात्रों के शिक्षा के अधिकार की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
