पैंगोलिन संरक्षण में ताडोबा की अनोखी पहल, रेडियो टेलीमेट्री से होगी निगरानी
Pangolin Conservation: ताडोबा-अंधारी बाघ प्रकल्प ने महाराष्ट्र में पहली बार पैंगोलिन संरक्षण के लिए रेडियो टेलीमेट्री शुरू की है। इससे उनके व्यवहार, आवास और पुनर्वास की वैज्ञानिक निगरानी की जा रही है।
- Written By: आलोक उमाकृष्ण
पैंगोलिन (सोर्सः सोशल मीडिया)
Maharashtra First Pangolin Telemetry Project: ताडोबा-अंधारी बाघ प्रकल्प ने संकटग्रस्त पैंगोलिन (झबरा बिल्लियाँ) के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक पहल शुरू की है। दुनिया में सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले सस्तन प्राणियों में शामिल पैंगोलिन का अवैध शिकार, तस्करी और प्राकृतिक आवास के लगातार घटते क्षेत्र के कारण गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। इन चुनौतियों को देखते हुए प्रकल्प प्रशासन ने बचाए गए पैंगोलिनों के पुनर्वास के बाद उनकी गतिविधियों पर वैज्ञानिक निगरानी रखने के लिए रेडियो टेलीमेट्री तकनीक का उपयोग शुरू किया है।
यह महाराष्ट्र में अपनी तरह की पहली टेलीमेट्री आधारित पैंगोलिन संरक्षण पहल मानी जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य न केवल इन दुर्लभ जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, बल्कि उनके व्यवहार, आवास और जीवनशैली को बेहतर ढंग से समझना भी है।
इकोसिस्टम इंजीनियर है पैंगोलिन
पैंगोलिन स्वभाव से बेहद शर्मीले और अकेले रहने के साथ साथ निशाचर जीव होते हैं। वे अपना अधिकांश समय जमीन के नीचे बने बिलों में बिताते हैं, जिसके कारण जंगल में उनकी गतिविधियों का अध्ययन करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। ये मुख्य रूप से चींटियों और दीमकों को खाते हैं तथा अपनी लंबी और चिपचिपी जीभ की सहायता से भोजन प्राप्त करते हैं। एक वयस्क पैंगोलिन वर्षभर में लाखों चींटियों और कीटों का सेवन कर प्राकृतिक कीट नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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इसके अलावा विशेषज्ञ उन्हें ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ भी मानते हैं, क्योंकि उनकी खुदाई से मिट्टी में वायु संचार बढ़ता है और पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। उनके बनाए बिलों का उपयोग खरगोश, मॉनिटर लिजर्ड, सांप और बिच्छू जैसे कई छोटे जीव आश्रय के रूप में करते हैं, जिससे जैव विविधता को भी लाभ मिलता है।
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VHF रेडियो ट्रांसमीटर लगाये गऐ है पैंगोलिनों पे
ताडोबा-अंधारी बाघ प्रकल्प ने इस अध्ययन के तहत बचाई गई दो मादा पैंगोलिनों के शरीर पर VHF रेडियो ट्रांसमीटर लगाए हैं। इनमें से एक उपवयस्क मादा को अप्रैल 2025 में पुनर्वासित किया गया था। जबकि दूसरी वयस्क मादा को चंद्रपुर क्षेत्र से बचाकर उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया। रेडियो टेलीमेट्री तकनीक के माध्यम से अनुसंधानकर्ता उनकी गतिविधियों, आवास चयन, व्यवहार और पुनर्वास के बाद जीवित रहने की क्षमता का लगातार अध्ययन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस शोध से पैंगोलिन संरक्षण की भविष्य की नीतियों, पुनर्वास प्रक्रियाओं और वन्यजीव प्रबंधन योजनाओं को वैज्ञानिक आधार मिलेगा। ताडोबा प्रशासन के अनुसार, यह पहल जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करने और कम चर्चित लेकिन अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
