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Mumbai की प्यास बुझाने के लिए 3 लाख से ज्यादा पेडों की बलि! बीएमसी के गारगाई बांध से जैव विविधता को खतरा
- Written By: सूर्यप्रकाश मिश्र | Edited By: आलोक उमाकृष्ण
Mumbai में बढ़ती पानी की मांग को पूरा करने के लिए प्रस्तावित गारगाई बांध परियोजना पर विवाद गहरा रहा है। लाखों पेड़ों की कटाई,वन्यजीवों के घरों पर खतरे और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई गई है

गारगाई बांध (सोर्सः सोशल मीडिया)
Mumbai Gargai Dam Project: कहावत है, “अनियंत्रित विकास,विनाश को जन्म देता है।” देश में तेजी से हो रहे अनेक तरह के संसाधनों के विकास में पर्यावरण को बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। इसी प्रकार पालघर जिले के वाडा तालुका में प्रस्तावित गारगाई बांध (डैम) को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। चर्चा है कि तेजी से बढ़ती मुंबई की आबादी की प्यास बुझाने के लिए ठाणे व पालघर के बड़े जलाशय कम पड़ने लगे हैं। ऐसे में नए डैम के निर्माण की योजना बन चुकी है।
लाखों पेडों व पक्षियों का अस्तित्व खतरे में
बीएमसी के प्रस्तावित बांध की वजह से लाखों पेड़ों के साथ असंख्य पक्षियों, वन्यजीवों का अस्तित्व मिटने वाला है। वाडा के वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी शरद पाटिल के अनुसंधान यहां मुंबई की प्यास बुझाने के लिए डैम के नाम पर जैव विविधता की बलि ली जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि पर्यावरण रक्षक मौन क्यों हैं ?
एक ओर परियोजना प्रभावित आदिवासियों के पुनर्वास का मुद्दा अनुत्तरित है, वहीं दूसरी ओर इस परियोजना के पर्यावरणीय दुष्परिणामों की ओर भी अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पुनर्वास संबंधी कानूनों की अनदेखी करते हुए 6 आदिवासी गांवों और 13 पाड़ों के लोगों पर अन्याय किया जा रहा है। मुंबई मनपा ने पिछली 23 अप्रैल 2026 को इस परियोजना के लिए ठेकेदार को कार्यादेश जारी कर प्रारंभिक स्तर पर निर्माण कार्य शुरू हो चुका है।
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मनपा के अतिरिक्त आयुक्त अभिजीत बांगर ने घोषणा की है कि अक्टूबर 2026 से बांध का वास्तविक निर्माण कार्य प्रारंभ होगा। ऐसे में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का क्या होगा, यह प्रश्न तो है ही, साथ ही पर्यावरणीय प्रभावों की उपेक्षा क्यों की जा रही है, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।
3,10,410 पेड़ों की कटाई
बताया गया है कि इस परियोजना के लिए लगभग 3,10,410 पेड़ों की कटाई की जाएगी। असंख्य पक्षियों और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होगा, जैव विविधता को गंभीर क्षति पहुंचेगी। नदियों और जलधाराओं का प्राकृतिक प्रवाह बदल जाएगा। विशाल जलाशय बनने से स्थानीय तापमान, आर्द्रता और वर्षा चक्र पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
तानसा और गारगाई नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में परिवर्तन होगा, जिससे निचले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक विशाल वन क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा। कुल मिलाकर यह परियोजना पर्यावरणीय क्षरण को बढ़ावा देगी, फिर भी पर्यावरण प्रेमियों की चुप्पी आश्चर्यजनक है।
अभयारण्य प्रभावित
शरद पाटिल का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता यहां बड़े पैमाने पर होने वाली वृक्ष कटाई की है। यह परियोजना तानसा वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में प्रस्तावित है। लगभग पूरा एक अभयारण्य प्रभावित होने जा रहा है। परियोजना से लगभग 840 हेक्टेयर भूमि प्रभावित होगी, जिसमें 658 हेक्टेयर वनभूमि तथा 170 हेक्टेयर निजी, गांवठाण और सरकारी भूमि शामिल है।
यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित है। इसलिए यह केवल पेड़ों की संख्या का मामला नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व का प्रश्न है।
मनपा का दावा
बीएमसी का कहना है कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उसके तीन गुना पेड़ लगाए जाएंगे। लेकिन एक परिपक्व वृक्ष का पर्यावरणीय महत्व और एक नए पौधे का महत्व समान नहीं हो सकता। इसकी प्रतिपूर्ति चंद्रपुर, हिंगोली और वाशिम जिलों में वृक्षारोपण कर की जाएगी। ऐसे में ठाणे और पालघर जिलों में नष्ट हुए जंगलों की भरपाई कैसे होगी। यहां पर्यावरणीय नुकसानों की जिम्मेदारी कौन लेगा? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
यह क्षेत्र पश्चिमी घाट का हिस्सा है, जिसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां अनेक दुर्लभ वनस्पतियां, औषधीय पौधे और वन्यजीवों के महत्वपूर्ण आवास मौजूद हैं। लाखों पेड़ों की कटाई से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाएगा। पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि वर्षा, तापमान नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और मृदा संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राज्य पर अलनीनो का खतरा
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खुद कहा है कि इस साल राज्य पर अलनीनो का प्रभाव होगा। अर्थात सामान्य से कम वर्षा होगी। ऐसे में वृक्ष कटाई से स्थानीय तापमान में वृद्धि, मृदा अपरदन और जलस्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है।
वृक्ष कटाई के बाद मिट्टी का कटाव बढ़ेगा और भूजल पुनर्भरण प्रभावित होगा। वन उपज, ईंधन, फल, फूल और चराई भूमि कम हो जाएगी। प्रकृति से जुड़ी पारंपरिक जीवनशैली भी संकट में पड़ जाएगी।
बढ़ेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष
इस परियोजना का सबसे अधिक असर वन्यजीवों पर पड़ेगा। लाखों पक्षियों के घोंसले नष्ट होंगे, पशुओं के आवास समाप्त होंगे और उनकी खाद्य श्रृंखला प्रभावित होगी। आवास नष्ट होने से वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है। गारगाई क्षेत्र के जंगल अनेक दुर्लभ और औषधीय वनस्पतियों का घर हैं। यहां भारतीय उल्लू की दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।
तेंदुआ बिल्ली, भारतीय साही, लाल रंग का नेवला, सिवेट, धारीदार लकड़बग्घा, पैंगोलिन और चौसिंगा सहित 50 से अधिक स्तनधारी प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग के 1992 के अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में 1980 तक बाघों की उपस्थिति भी दर्ज की गई थी। इसके अतिरिक्त यहां लगभग 212 पक्षी प्रजातियां, मोर, किंगफिशर, कठफोड़वा, विभिन्न प्रकार के उल्लू, प्रवासी पक्षी तथा अनेक स्थानीय पक्षी पाए जाते हैं। लगभग 70 प्रकार के सरीसृप, जिनमें नाग, धामन, छिपकलियां और कछुए शामिल हैं, यहां निवास करते हैं। पश्चिमी घाट अपने स्थानीय मेंढक प्रजातियों के लिए भी प्रसिद्ध है।
जंगल और जलस्रोतों में परिवर्तन का इन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। मधुमक्खियां, तितलियां और अन्य परागण करने वाले कीट, जो कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, भी प्रभावित होंगे। 400 से अधिक वनस्पति प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। पक्षियों के घोंसले, जानवरों के आश्रय स्थल, जल स्रोत और प्रजनन क्षेत्र नष्ट हो जाएंगे। कई प्रजातियों को पलायन करना पड़ेगा, जबकि कुछ स्थानीय स्तर पर विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं।
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पर्यावरणीय त्रासदी
पश्चिमी घाट का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि लाखों वनस्पतियों, जीवों, पक्षियों, कीटों और सूक्ष्मजीवों का परस्पर जुड़ा हुआ जीवन तंत्र है। इसकी क्षति एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी होगी। मुंबई की प्यास बुझाने के लिए एक संपूर्ण अभयारण्य, उसकी जैव विविधता और आदिवासी विरासत को दांव पर लगाया जा रहा है।
जानकारों का मानना है कि मुंबई एमएमआर की पानी समस्या का समाधान केवल बड़े बांधों का निर्माण नहीं है। पानी चोरी और जल रिसाव रोकना, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, मौजूदा जलस्रोतों का बेहतर प्रबंधन तथा समुद्री जल के शुद्धिकरण जैसे विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अनुमान है कि मुंबई के कुल जलापूर्ति तंत्र का लगभग 34 प्रतिशत पानी व्यर्थ चला जाता है। इसलिए ‘नॉन-रेवेन्यू वाटर’ के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता है। ग्रामीण जीवन और त्रासदी को नजदीक से देखने वाले शरद पाटिल का कहना है कि, दुर्भाग्यवश, ऐसा प्रतीत होता है कि मुंबई की जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के अस्तित्व को दांव पर लगाया जा रहा है। इस पूरे मामले में पर्यावरण प्रेमियों की चुप्पी कई तरह के सवाल खड़े करती है।
Mumbai gargai dam project tree cutting environmental threat
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