चंद्रपुर को उद्योग हब बनाने की मांग तेज; बिजली, जमीन और सब्सिडी की समस्याएं बनी बाधा

Chandrapur Industrial Development: चंद्रपुर में भूमि, बिजली दर व कोयला आपूर्ति जैसी बाधाओं से सूक्ष्म‑लघु उद्योग दबे हुए हैं। उद्योग जगत ने मानसून सत्र में सुविधाए दिलाने की मांग उठाई।
Chandrapur MSME Support Maharashtra
Chandrapur CTPS (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Chandrapur MSME Support Maharashtra: औद्योगिक और खनिज संपदा से संपन्न जिला होने के बावजूद चंद्रपुर में विकास की कई गंभीर समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। एक ओर मुख्यमंत्री राज्य में औद्योगिक निवेश और उद्योगों को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर यहां की स्थानीय समस्याएं लंबे समय से अनसुलझी हैं। उद्योगों के लिए जमीन की अनुपलब्धता, कोयले की अनियमित आपूर्ति, बिजली की बढ़ती दरें, सब्सिडी मिलने में अत्यधिक विलंब और नए उद्योगों की स्थापना के लिए बुनियादी ढांचागत सुविधाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर) की कमी के कारण यहां के सूक्ष्म एवं लघु उद्योग (MSMEs) अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।

हालिया दिनों में जहां पड़ोसी जिले गड़चिरोली के औद्योगिक विकास में तेजी आई है, वहीं पहले से मजबूत आर्थिक आधार वाले चंद्रपुर की गति धीमी होती जा रही है। इस स्थिति ने स्थानीय उद्यमियों की चिंता बढ़ा दी है। चंद्रपुर के उद्योग जगत को उम्मीद है कि राज्य सरकार आगामी मानसून सत्र में इन गंभीर मुद्दों पर सकारात्मक ध्यान देगी।

पर्यावरण पूरक 'हरित उद्योगों' को बढ़ावा देने की आवश्यकता

चंद्रपुर जिले की एक प्रमुख समस्या लगातार बढ़ता तापमान और प्रदूषण भी है। यहां थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश (उड़ने वाली राख) के वैज्ञानिक प्रबंधन में समन्वय की भारी कमी दिखाई देती है। इसके साथ ही, समय की मांग बन चुके 'हरित उद्योगों' (ग्रीन इंडस्ट्रीज) को बढ़ावा देने के लिए अब तक कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है, और कृषि आधारित प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) उद्योगों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

स्थानीय जानकारों का मानना है कि जिले में स्थित बिजली केंद्रों, एमईएल इस्पात उद्योग, सीमेंट व लौह अयस्क उद्योगों के साथ-साथ कोयला खदानों को पर्यावरण-अनुकूल ग्रीन सूक्ष्म व लघु उद्योगों के विकास के लिए मददगार बनाया जाना चाहिए। इन सूक्ष्म व लघु ग्रीन उद्योगों के माध्यम से क्षेत्र में हजारों नए रोजगार के अवसरों का सृजन किया जा सकता है।

ओवरबर्डन (खनन अपशिष्ट) से पैदा हो सकते हैं रोजगार के नए साधन

कोयला खदानों के खनन से निकलने वाले ओवरबर्डन (मलबे के ढेर) की डंपिंग एक गंभीर समस्या बनी हुई है। पूर्व सांसद प्रतापराव पाटिल चिखलीकर ने संसद में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। उस समय पर्यावरण सुधार (इको रेस्टोरेशन) के लिए इन मलबे के ढेरों पर बांसारोपण को बढ़ावा देने का प्रस्ताव लाया गया था। इससे 'बायोमास आधारित ग्रीन एनर्जी' का एक बेहतर विकल्प भी मिलने की उम्मीद थी, परंतु नागपुर स्थित वेकोलि (WCL) मुख्यालय के नियमों का हवाला देकर इस दिशा में चंद्रपुर में प्रयास धीमे पड़ गए। यदि वेकोलि पहल करे, तो बांस रोपण, मानव संसाधन, चारकोल और एनर्जी जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्थानीय युवाओं को रोजगार दे सकती है।

कृषि और वन विभाग के समन्वय से होगा कायाकल्प

विदर्भ के कृषि विभाग, वन विभाग और कृषि विश्वविद्यालयों (कृषि विद्यापीठ) के साथ यदि स्थानीय उद्यमियों का बेहतर समन्वय स्थापित हो, तो जिले में कई कृषि व वन आधारित ग्रीन इंडस्ट्रीज खड़ी की जा सकती हैं। इनमें मुख्य रूप से फल, सब्जी और वनोपज प्रसंस्करण उद्योग शामिल होंगे, जो स्थानीय किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के बेरोजगार युवाओं को बड़ी आर्थिक राहत प्रदान करेंगे।

इसके लिए नीरी (NEERI), आत्मा (ATMA) विभाग, वीएनआईटी (VNIT) और इग्नू (IGNOU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की मदद लेकर इस क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति लाई जा सकती है। इजरायल, जापान और वियतनाम की तर्ज पर यहां 'हरित विकास का मॉडल' विकसित किया जाना चाहिए। इस दिशा में पहले एक विशेष अनुसंधान टीम काम करे, जिसके बाद अनुभवी उद्यमियों और कॉर्पोरेट कंपनियों की मदद ली जा सकती है।

एमएसएमई को मिले गुजरात की तर्ज पर सुविधाएं: एमआईडीसी एसोसिएशन

चंद्रपुर एमआईडीसी इंडस्ट्रीज एसोसिएशन अध्यक्ष मधुसूदन रुंगटा ने कहा है कि  "मुख्यमंत्री गड़चिरोली के विकास को लेकर आश्वस्त हैं, लेकिन चंद्रपुर में भी औद्योगिक विकास की असीम संभावनाएं मौजूद हैं। हमें पूरी आस है कि इस मानसून सत्र में सरकार लघु व सूक्ष्म उद्योगों को गुजरात की तर्ज पर विशेष रियायतें और सेवा-सुविधाएं प्रदान करेगी, क्योंकि देश में सर्वाधिक रोजगार इसी क्षेत्र से मिलता है। यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो आने वाले समय में चंद्रपुर और गड़चिरोली संयुक्त रूप से मध्य भारत के सबसे बड़े औद्योगिक हब बन सकते हैं।"

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