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प्रकल्प प्रभावितों का 42 साल से वनवास जारी, कमकासूर के 6 परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित

42 वर्षों से कमकासूर के 6 परिवार मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। जानें उनकी दयनीय स्थिति और संघर्ष के बारे में।

  • Author By Anuj Sahu | published By महाराष्ट्र डेस्क |
Updated On: Apr 08, 2026 | 08:13 PM
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Bhandara News: महाराष्ट्रमध्यप्रदेश सीमा पर बावनथली नदी पर वर्ष 1984 में बने राजीवसागर परियोजना ने जहां हजारों एकड़ भूमि को सिंचित किया, वहीं इस परियोजना के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले लोगों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है. जिले के तुमसर तहसील अंतर्गत कमकासूर गांव के छह परिवार पिछले 42 वर्षों से न्याय और अपने अधिकारों की प्रतीक्षा में घने जंगलों में जीवन बिताने को मजबूर हैं.

कागजों में पुनर्वास, हकीकत में संघर्षसरकारी दस्तावेजों में कमकासूर गांव का पुनर्वास दिखाया गया है. परियोजना के लिए यहां के आदिवासी परिवारों ने अपनी पीढ़ियों पुरानी जमीनें छोड़ दीं और लगभग 99 प्रतिशत गांव ने विस्थापन स्वीकार कर लिया. लेकिन छह परिवार आज भी गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि सरकार ने उन्हें रहने के लिए भूखंड तो दिया, लेकिन आजीविका के लिए खेती की जमीन नहीं दी. ऐसे में वे बिना जमीन के कैसे जीवन यापन करें, यह बड़ा सवाल है.

जंगल में जीवन, सुविधाओं का अभावये परिवार आज भी घने जंगलों से घिरे क्षेत्र में रह रहे हैं, जहां न सड़क है, न बिजली और न ही पीने के पानी की कोई व्यवस्था. गांव में बिजली के खंभे तो लगाए गए हैं, लेकिन उनमें सप्लाई नहीं है. चारों ओर जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है, फिर भी ये परिवार अपनी आस्था और हक की लड़ाई के चलते वहां डटे हुए हैं. बीमारी की स्थिति में इन परिवारों को करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर टांगला स्थित स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है. रात के समय जंगल से गुजरना बेहद जोखिम भरा साबित होता है.

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मुआवजा नाकाफी, शासन पर सवालप्रभावित परिवारों का कहना है कि 42 वर्ष पहले दिया गया मुआवजा आज के महंगाई के दौर में बेहद कम है, जिससे जीवन चलाना संभव नहीं है. उनका सवाल है कि जब परियोजना की लागत बढ़ने पर सरकार अतिरिक्त धन देती है, तो प्रभावितों के लिए सहायता क्यों नहीं बढ़ाई जाती.

जमीन के लिए संघर्ष जारीइन आदिवासी परिवारों की मुख्य मांग है कि उन्हें रहने के लिए जमीन नहीं, बल्कि खेती के लिए भूमि दी जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें. उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक उन्हें आजीविका का स्थायी साधन नहीं मिलता, तब तक वे गांव नहीं छोड़ेंगे. अब देखना यह है कि प्रशासन इन प्रकल्प प्रभावितों की पीड़ा को समझकर उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस कदम उठाता है या उनका यह लंबा वनवास यूं ही जारी रहेगा.

Project affected people continue to live in exile for 42 years

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Published On: Apr 08, 2026 | 06:24 PM

Topics:  

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