बीएसएनएल नेटवर्क (सौजन्य-सोशल मीडिया)
BSNL Digital Bharat Nidhi: संचार के आधुनिक युग में जहाँ इंटरनेट जीवन की अनिवार्य जरूरत बन चुका है, वहीं खराब नेटवर्क अक्सर उपभोक्ताओं के लिए बड़ी बाधा साबित होता रहा है। विशेषकर बीएसएनएल के ग्राहकों को पिछले कुछ वर्षों में कनेक्टिविटी की जिस मार को झेलना पड़ा, उससे कई उपभोक्ताओं का मोहभंग हो गया था। लेकिन अब BSNL एक नई ऊर्जा और डिजिटल भारत निधि के भारी-भरकम निवेश के साथ मैदान में उतरा है, जिससे नेटवर्क की पुरानी समस्याएं अब इतिहास बनने जा रही हैं।
BSNL प्रबंधन ने अपनी दशकों पुरानी 2जी तकनीक को अलविदा कहकर सीधे हाई-स्पीड 4जी तकनीक को अपना लिया है। कंपनी का सबसे बड़ा प्रहार उन इलाकों पर है, जो भौगोलिक जटिलताओं के कारण आज भी मुख्यधारा से कटे हुए हैं। आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में आज भी पक्की सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं, वहां बीएसएनएल ने अपने टावर खड़े कर दिए हैं।
यह कदम उन आदिवासी भाई-बहनों के लिए वरदान साबित हो रहा है, जो संचार के अभाव में शेष दुनिया से अलग-थलग थे।नेटवर्क विस्तार की रफ्तार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल एक टावर को स्थापित करने में लगभग 50 लाख रुपये की लागत आ रही है।
पिछले वर्ष 2025 में भंडारा और गोंदिया जिलों के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में 37 नए टावर लगाए जा चुके हैं। विस्तार का यह रथ साल 2026 में भी रुकने वाला नहीं है, वर्तमान में 14 नए टावर लगाने का काम युद्ध स्तर पर जारी है। वर्तमान में दोनों जिलों की सीमा में BSNL के लगभग 725 टावर दिन-रात अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि निजी टेलिकॉम कंपनियों की पहुंच से बाहर रहने वाले इन क्षेत्रों में बीएसएनएल की यह डिजिटल छलांग मील का पत्थर साबित होगी। मोबाइल नेटवर्क पहुंचने से अब इन दुर्गम गांवों के छात्र ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ सकेंगे, मरीजों को टेली-मेडिसिन की सुविधा मिलेगी और किसान सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे अपने मोबाइल पर उठा पाएंगे। 4जी अपग्रेडेशन की इस लहर ने स्थानीय नागरिकों में एक नई उम्मीद जगाई है, जिससे बीएसएनएल के प्रति ग्राहकों का पुराना भरोसा फिर से बहाल होता दिख रहा है।
देश को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने की दिशा में सरकार और बीएसएनएल की ओर से उठाए जा रहे कदमों के बीच एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में संचार की पहुंच बनाने के लिए स्थापित किए जा रहे एक मोबाइल टॉवर की अनुमानित लागत लगभग 50 लाख रुपये आ रही है।
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इस भारी-भरकम राशि में टॉवर की संरचना, उपकरण, बिजली आपूर्ति और तकनीकी इंस्टॉलेशन सहित सभी प्रकार के खर्चे शामिल हैं। विशेष बात यह है कि इस पूरी परियोजना के लिए वित्तीय सहायता डिजिटल भारत निधि (जिसे पूर्व में यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड – USOF के नाम से जाना जाता था) के तहत प्रदान की जा रही है।
भंडारा ऑपरेशन एरिया के डीजीएम पी.जी. परिहार ने कहा कि दुर्गम और आदिवासी इलाकों में अपनी सेवाएं देने के लिए फिलहाल कोई भी निजी कंपनी तैयार नहीं है, लेकिन वहां कनेक्टिविटी पहुंचाना हमारी सामाजिक और प्रशासनिक प्रतिबद्धता है। इस पहल को लेकर ग्राहकों की ओर से बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा है।