भंडारा के 22 बाढ़ प्रभावित गांव दहशत में, पुनर्वास का मुद्दा फिर चर्चा में
Flood Line Villages: भंडारा जिले में वैनगंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र में आने वाले 22 गांवों के नागरिक मानसून शुरू होते ही दहशत में हैं। वर्षों से लंबित पुनर्वास की मांग अब फिर जोर पकड़ने लगी है।
- Written By: केतकी मोडक
वैनगंगा नदी फाईल फोटो (सोर्स - सोशल मीडिया)
Bhandara Wainganga River Flood Line Villages: मानसून शुरू होते ही जिले के नदी किनारे बसे 22 गांवों के लोगों की जान पर बन आती है। वैनगंगा नदी में आने वाली भीषण बाढ़ और बाढ़ नियंत्रण रेखा (फ्लड लाइन) के दायरे में आने वाले ये गांव हर साल मौत के साए में जीने को मजबूर हैं। वर्षों से पुनर्वास की मांग उठाई जा रही है, लेकिन प्रशासन की उदासीनता के कारण ग्रामीणों में भारी नाराजगी है।
प्रभावित गांवों की भयावह स्थिति
भंडारा तहसील के दवडीपार, खमारी बुट्टी, कोरंभी, तिड्डी, बेरोडी, कोधुर्णा, खापा, कारधा, कवडसी, दाभा, कोंढी, सालेबडर्डी, लोहारा, करचखेडा, खैरी, जमनी, पेवठा, मुजबी और खंबाटा, तथा पवनी तहसील के कुझाँ, इटगांव और पौना खुर्द सहित कुल 22 गांव हर वर्ष बाढ़ की मार झेलते हैं। इनमें कारधा गांव की स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। 28 अगस्त 2020 की बाढ़ में यहां 500 से 600 घर प्रभावित हुए थे। इसके बाद 10 और 15 अगस्त 2022 को लगातार आई बाढ़ में 100 से अधिक घरों को नुकसान पहुंचा।
बरसात में मकानों की दीवारें भीगकर गिरने लगती हैं और जहरीले सांप-बिच्छू घरों में घुस आते हैं, जिससे लोगों की जान जोखिम में रहती है। अब जिले के इन 22 गांवों के पुनर्वास प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देकर लोगों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की मांग जोर पकड़ रही है।
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जून से अक्टूबर 2025 के दौरान प्राकृतिक आपदाओं का आकलन
भंडारा जिले में प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला लगातार जारी है। जून 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच पांच महीनों में जिले को कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा। इसमें कुल जनहानि-4 मौतें (मुआवजा वितरित), पशुहानि-48 (29 बड़े एवं 19 छोटे पशु), मकानों का नुकसान-कुल 1,645 (1,428 आंशिक, 48 पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त, 169 गौशालाएं/झोपड़ियां), सर्वाधिक प्रभावित तहसीलें पवनी (528 मकान), तुमसर (204 मकान) है।
आपातकालीन व्यवस्थाएं तैयार : नामदास
जिला आपदा एवं प्रबंधन अधिकारी अभिषेक नामदास ने बताया कि मानसून को देखते हुए प्रशासन ने आपातकालीन व्यवस्थाएं तैयार कर ली हैं। प्रत्येक तहसील और बाढ़ प्रभावित गांवों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। जून से अक्टूबर के दौरान आई प्राकृतिक आपदाओं से मिले अनुभवों के आधार पर भविष्य में जन-धन की हानि कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिन गांवों में बाढ़ का खतरा अधिक है, वहां समय पर सूचना पहुंचाने के लिए संदेश व्यवस्था को और मजबूत बनाया गया है।
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कब तक मौत के साए में जीते रहेंगे
खमारी निवासी आज्ञेश्वर मेश्राम ने कहा कि, हर साल बारिश शुरू होते ही हमारी जान सांसत में पड़ जाती है। वैनगंगा नदी में बाढ़ आते ही पानी सीधे घरों में घुस जाता है। हमारे कच्चे मकानों की दीवारें कब गिर जाएंगी। इसका भरोसा नहीं रहता। कई बार हमारा पूरा घर-बार उजड़ चुका है। सरकार से राहत तो मिलती है, लेकिन वह केवल अस्थायी मरहम है। हमें स्थायी और सुरक्षित पुनर्वास चाहिए, आखिर हम कब तक मौत के साए में जीते रहेंगे?
