भंडारा में 77 में से 76 बच्चे HIV मुक्त, समय पर उपचार से बचा जीवन, नेविरापिन-CPT सिरप की भूमिका अहम
Bhandara News: महाराष्ट्र के भंडारा जिले में एचआईवी से पीड़ित महिलाओं के बच्चों को जीवनदान मिला है। समय पर उपचार के चलते 77 एचआईवी से ग्रसित बच्चों में से 76 को मुक्त किया गया है।
- Written By: प्रिया जैस
बच्चे HIV मुक्त (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Bhandara News: एचआईवी/एड्स से संक्रमित गर्भवती महिलाओं के भविष्य के साथ ही उनके शिशुओं का भी सवाल हमेशा गंभीर चिंता का विषय रहा है। आमतौर पर यह डर रहता है कि मां से पैदा होने वाला बच्चा भी इस घातक संक्रमण की चपेट में आ सकता है। लेकिन भंडारा जिले में एआरटी सेंटर और ईएमटीसीटी कार्यक्रम के माध्यम से यह चिंता काफी हद तक दूर हुई है।
पिछले सात वर्षों में 77 एचआईवी पॉज़िटिव गर्भवती माताओं ने संतान को जन्म दिया, जिनमें से 76 बच्चे पूरी तरह स्वस्थ और एचआईवी मुक्त पाए गए हैं। गर्भवती महिला को जब यह पता चलता है कि वह एचआईवी संक्रमित है, तब उसके पांव तले जमीन खिसक जाती है। लेकिन समय पर उपचार मिलने पर मां ही नहीं, नवजात का भी जीवन सुरक्षित किया जा सकता है।
समय पर उपचार से बचा जीवन
जिले में एआरटी सेंटर में जांच के बाद 77 महिलाओं में संक्रमण की पुष्टि हुई। तत्काल सभी को एआरटी (एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी) पर लाया गया। परिणामस्वरूप माताओं ने न केवल सुरक्षित प्रसव किया, बल्कि अपने बच्चों को स्तनपान भी कराया। इसके बावजूद शिशुओं को संक्रमण नहीं हुआ। नियोजित औषधोपचार से यह चमत्कार संभव हो सका है।
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जन्म के बाद सभी शिशुओं की 18 महीने तक जांच की गई। इनमें से 76 बच्चे एचआईवी निगेटिव पाए गए, जबकि केवल एक बच्चा संक्रमित निकला है और वह एआरटी उपचार प्राप्त कर रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि समय पर दवाएं मिलने से शिशु तक संक्रमण पहुंचने से रोका जा सकता है।
नेविरापिन और सीपीटी सिरप की भूमिका अहम
जैसे ही महिला के गर्भवती रहते संक्रमण की पुष्टि होती है, उसे नेविरापिन की खुराक दी जाती है। इससे मां की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। नवजात शिशु के जन्म के तुरंत बाद उसे भी नेविरापिन सिरप पिलाया जाता है। इसके बाद डेढ़ से तीन महीने में सीपीटी सिरप की खुराक दी जाती है। इन दवाओं का असर इतना प्रभावी है कि 18 महीने बाद होने वाली डीएनए पीसीआर जांच में अधिकांश बच्चे संक्रमण से पूरी तरह मुक्त पाए जाते हैं।
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भंडारा जिले का यह अनुभव साबित करता है कि एचआईवी पॉज़िटिव माताओं से जन्मे बच्चे भी पूरी तरह से स्वस्थ रह सकते हैं। यदि गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच और उचित उपचार मिले, तो मां से बच्चे तक संक्रमण रोकथाम का सपना साकार हो सकता है। यह न केवल माताओं के जीवन में उम्मीद जगाता है, बल्कि समाज में एड्स के डर को भी कम करता है।
