क्या आंख मूंद रहा है सिस्टम? कानून के रखवाले ही अनुशासन भूलें तो भरोसा कैसे बचे? संभाजीनगर में सवाल

Sambhajinagar Police: संभाजीनगर पुलिस आयुक्तालय में अनुशासनहीनता, देर से उपस्थिति और तकनीक से बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सवाल है-जब जवाबदेही कमजोर है तो कानून का भरोसा कैसे कायम रहेगा?
Is the system turning a blind eye? How can trust be preserved if the law enforcers themselves forget discipline? Questions in Sambhajinagar
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Sambhajinagar Police Accountability: छत्रपति संभाजीनगर जिस पुलिस तंत्र पर शहर की सुरक्षा, कानून का राज और प्रशासनिक भरोसा टिका है, उसी तंत्र के भीतर अनुशासनहीनता अब छिपी हुई समस्या नहीं रही। छत्रपति संभाजीनगर शहर पुलिस आयुक्तालय में सामने आ रही अंदरूनी शिकायतें, व्यावहारिक उदाहरण और कार्यशैली यह संकेत दे रही है कि लापरवाही अब अपवाद नहीं, बल्कि धीरे धीरे व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है।

सवाल यह नहीं कि समस्या है या नहीं। सवाल यह है कि क्या इस पर आंख मूंद ली गई है। सूत्रों के अनुसार कई थानों और शाखाओं में ड्यूटी के प्रति उदासीनता सामान्य होती जा रही है। वरिष्ठ अधिकारी समय से पहले कार्यालय और फील्ड में पहुंचते हैं, जबकि अधीनस्थ कर्मचारियों की उपस्थिति देर से, अनियमित या नाम मात्र की देखी जाती है।

हाजिरी रजिस्टर और डिजिटल उपस्थिति प्रणाली अनुशासन लागू करने के बजाय केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। सवाल उठता है कि जब उपस्थिति का सत्यापन ही कमजोर है, तो जवाबदेही किस आधार पर तय होगी।

अपराध रिकॉर्ड प्रबंधन, डिजिटल सिस्टम, कंप्यूटर आधारित रिपोर्टिंग और मानव संसाधन प्रक्रिया आधुनिक पुलिसिंग की रीढ़ हैं। लेकिन शहर पुलिस आयुक्तालय के भीतर एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आ रही है। तकनीकी कार्यों को सीखने से बचना, काम न आने का बहाना बनाना और जिम्मेदारियों से दूरी बनाना।

कर्मचारियों और अधिकारियों पर पड़ा प्रभाव

इसका सीधा असर जांच की गति, केस फाइलों की गुणवत्ता और प्रशासनिक निर्णवों पर पड़ रहा है। यह अक्षमता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने की रणनीति मानी जा रही है। बीट और फील्ड ड्यूटी से बचाव। आराम की ड्यूटी की दौड़, ड्यूटी आवंटन को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।

बीट ड्यूटी और फील्ड जिम्मेदारियों से बचने के प्रयास किए जाते हैं। सीमित समय में न्यूनतम काम करने की मानसिकता हावी होती जा रही है। भोजन, विश्राम और निजी कामों के नाम पर घंटों की अनुपस्थिति अब असामान्य नहीं रही।

इसका बोझ उन्हीं कर्मचारियों और अधिकारियों पर पड़ता है जो ईमानदारी से ड्यूटी निभा रहे हैं। ड्यूटी के दौरान सिविल ड्रेस में घूमना, तय वर्दी मानकों की अनदेखी और अनुशासित व्यवहार से दूरी अब खुलेआम शहर पुलिस कर्मचारियों में देखी जा रही है। यह केवल नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि विभागीय छवि पर सीधा हमला है।

जवाबदेही तय करते ही टकराव

सूत्र बताते हैं कि जैसे ही लापरवाही पर सवाल उठते हैं या जवाबदेही तय करने की कोशिश होती है। कुछ कर्मचारी अनुपस्थिति, वरिष्ठ अधिकारियों से टकराव और बाहरी प्रभावों का सहारा लेने लगते हैं। इससे ईमानदारी से काम कर रहे अधिकारियों पर मानसिक और प्रशासनिक दबाव बढ़ता है, सीमित मानव संसाधन के बीच वरिष्ठ अधिकारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारिया उठानी पड़ती है, जबकि लापरवाह तत्व व्यवस्था को भीतर से कमजोर करते रहते हैं।

सवाल टालने का वक्त नहीं

अब मांग उठ रही है कि पुलिस जैसे अनुशासित बल के लिए स्पष्ट जवाबदेही तंत्र और मजबूत आंतरिक निगरानी व्यवस्था लागू की जाए। ऐसा तंत्र जिसमें ईमानदार कर्मचारियों को संरक्षण मिले और लापरवाही को ढाल न मिले।

न उत्पीड़न हो, न संरक्षण केवल नियम और निष्पक्ष कार्रवाई, यदि शहर पुलिस आयुक्तालय के भीतर पनप रहीं यह स्थिति समय रहते नहीं सुधारी गई, तो इसका असर केवल विभाग तक सीमित नहीं रहेगा।

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