छत्रपति संभाजीनगर मनपा (सोर्स-सोशल मीडिया) 
औरंगाबाद

छत्रपति संभाजीनगर मनपा में 10 लाख से अधिक की फाइलों पर प्री-ऑडिट विवाद, स्थायी समिति ने लगाई तत्काल रोक

Sambhajinagar Pre Audit Controversy: छत्रपति संभाजीनगर मनपा की स्थायी समिति ने 10 लाख रुपये से अधिक की फाइलों के प्री-ऑडिट पर रोक लगा दी। नगरसेवकों ने इसे विकास कार्यों में देरी का कारण बताया।

आलोक उमाकृष्ण

Chhatrapati Sambhajinagar Pre Audit Controversy: मनपा की स्थायी समिति की बैठक सोमवार को प्री-ऑडिट व्यवस्था को लेकर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच तीखी बहस का मंच बन गई। दस लाख रुपये से अधिक की विकास कार्यों की फाइलों का प्री-ऑडिट किए जाने पर नगरसेवकों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।

उनका कहना था कि जब मनपा अधिनियम में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था ही नहीं है, तब इस प्रक्रिया के कारण विकास कार्यों की मंजूरी महीनों तक लंबित रखना उचित नहीं है। लंबी चर्चा और प्रशासन के साथ तीखी नोकझोंक के बाद स्थायी समिति के सभापति अनिल मकरिये ने प्री-ऑडिट की प्रक्रिया तत्काल बंद करने के निर्देश दिए।

विकास कार्यों की गति पर लगा ब्रेक

बैठक में यह मुद्या नगरसेवक राज वानखेडे ने उठाते हुए कहा कि दस लाख रुपये से अधिक लागत वाली योजनाओं और विकास कार्यों की फाइलें मुख्य लेखा परीक्षक कार्यालय में प्री-ऑडिट के नाम पर लंबे समय तक अटकी रहती हैं।

इससे सड़क, जलापूर्ति, नाली, भवन और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े कार्य समय पर शुरू नहीं हो पाते। इसका सीधा असर शहर के विकास और आम नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ रहा है।

भाजपा नगरसेवक राजगौरव वानखेड़े ने कहा कि प्री-ऑडिट के कारण फाइलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी हो रही है। यदि कानून में इसका कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो इस व्यवस्था को जारी रखना नियमों के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के कारण विकास कार्यों की गति प्रभावित हो रही है।

आयुक्त ने पारदर्शिता का दिया तर्क

महानगरपालिका आयुक्त अमोल येडगे ने नगरसेवकों के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि यद्यपि अधिनियम में प्री-ऑडिट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी वित्तीय मामलों में पारदर्शिता बनाए रखने और संभावित अनियमितताओं को रोकने के लिए आवश्यक होने पर ऐसी जांच की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि बड़े वित्तीय मामलों में अतिरिक्त सतर्कता बरतना प्रशासन की जिम्मेदारी है और इसी उद्देश्य से यह प्रक्रिया अपनाई गई थी।

मुख्य लेखा परीक्षक ने बताई वास्तविक स्थिति

मुख्य लेखा परीक्षक शिवाजी नाईकवाडे ने बैठक में स्वीकार किया कि प्री-ऑडिट के लिए अलग से कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। उन्होंने बताया कि तत्कालीन आयुक्त के निर्देशों के आधार पर दस लाख रुपये से अधिक की फाइलों का प्री-ऑडिट किया जा रहा था।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि लेखा विभाग में स्वीकृत 23 पदों के मुकाबले केवल 11 कर्मचारी कार्यरत हैं। सीमित कर्मचारियों के कारण प्री-ऑडिट और पोस्ट-ऑडिट दोनों कार्यों का दायित्व एक साथ निभाना पड़ रहा है, जिससे कार्यों में विलंब होना स्वाभाविक है।

वार्ड अधिकारियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी

बैठक में वार्ड अधिकारियों की अनुपस्थिति का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। सभापति अनिल मकरिये ने इस पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए निर्देश दिए कि अगली स्थायी समिति की बैठक से सभी वार्ड अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

इस पर आयुक्त अमोल येडगे ने कहा कि क्षेत्रीय कार्यों की व्यस्तता के कारण प्रत्येक बैठक में सभी अधिकारियों की उपस्थिति संभव नहीं होती। हालांकि सभापति ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कर दिया कि स्थायी समिति की बैठकों में संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

प्री-ऑडिट तत्काल बंद करें

लंबी चर्चा के बाद सभापति अनिल मकरिये ने प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि जिस प्रक्रिया का कानूनी आधार स्पष्ट नहीं है, उसके कारण विकास कार्यों की फाइलें लंबित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने प्री-ऑडिट व्यवस्था तत्काल बंद करने के निर्देश देते हुए कहा कि विकास कार्यों को अनावश्यक रूप से रोकना जनहित के विपरीत है।

मतभेद खुलकर आए सामने

बैठक के दौरान यह भी स्पष्ट हो गया कि विकास कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखने और उन्हें समय पर पूरा कराने के तरीके को लेकर प्रशासन और नगरसेवकों के बीच मतभेद अभी भी कायम हैं।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि स्थायी समिति के निर्देशों के बाद छत्रपति संभाजीनगर महानगरपालिका प्रशासन आगे क्या निर्णय लेता है और लंबित विकास कार्यों की फाइलों का निस्तारण कितनी तेजी से किया जाता है।

– नवभारत लाइव के लिए छत्रपति संभाजीनगर से शफीउल्ला हुसैनी की रिपोर्ट

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