प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Shiv Sena UBT Performance: छत्रपति संभाजीनगर महानगरपालिका चुनाव में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट का कमजोर प्रदर्शन केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संदेश का संकेत है।
जिन परिस्थितियों में पार्टी ने यह चुनाव लड़ा, वहां भावनात्मक अपील, सहानुभूति और परंपरागत आधार के भरोसे जीत संभव नहीं थी। नतीजतन, 99 उम्मीदवार उतारने के बावजूद केवल छह की जीत यह बताती है कि संगठनात्मक कमजोरी अब छिप नहीं सकती।
उद्धव गुट की सबसे बड़ी चुनौती अंदरूनी कलह रही। टिकट वितरण को लेकर नाराजगी, पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी और स्पष्ट नेतृत्व की कमी ने पार्टी को भीतर से कमजोर किया। चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही पार्टी का मनोबल बंट चुका था। ऐसे में मतदाताओं तक एकजुट संदेश पहुंच पाना संभव नहीं हो सका।
चुनावी राजनीति अब केवल सभाओं और नारों से नहीं चलती। जमीनी स्तर पर बूथ प्रबंधन, स्थानीय मुद्दों पर स्पष्ट रुख और निरंतर संवाद जरूरी होता है। उद्धव गुट इन तीनों मोर्चों पर कमजोर दिखा।
प्रचार में न तो आक्रामकता दिखी और न ही स्पष्ट दिशा। एकमात्र बड़ी सभा भी कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने में असफल रही। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सहानुभूति एक कारक हो सकती है, लेकिन मनपा जैसे स्थानीय चुनावों में मतदाता सीधे काम और नेतृत्व का हिसाब मांगता है।
सड़क, पानी, सफाई और प्रशासन जैसे मुद्दों पर ठोस भरोसा पैदा करने में उद्धव गुट पीछे रह गया। मतदाता भावनाओं से अधिक व्यावहारिक निर्णय लेते नजर आए। भाजपा और शिंदे गुट ने इस कमजोरी का पूरा लाभउठाया, संगठित ढांचा, स्पष्ट नेतृत्व और समन्वित रणनीति ने उन्हें बढ़त दिलाई। वहीं अन्य दल भी उद्धव गुट के कमजोर आधार में सेंध लगाने में सफल रहे।
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यह चुनाव उद्धव गुट के लिए चेतावनी है। यदि पार्टी को भविष्य में प्रासंगिक बने रहना है तो उसे भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर संगठन, अनुशासन और स्थानीय नेतृत्व पर पकड मजबूत करनी होगी। बिना आत्ममंथन और ठोस पुनर्गठन के राजनीतिक जमीन दोबारा हासिल करना कठिन होगा।