
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Municipal Election Results: छत्रपति संभाजीनगर मनपा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी की सांगठनिक कमजोरी और रणनीतिक चूकों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। जिस चुनाव में कांग्रेस के पास शिवसेना-भाजपा के लंबे सत्ता-विरोध का राजनीतिक लाभ उठाने का सुनहरा अवसर था, उसी चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सबसे निराशाजनक रहा।
दैनिक नवभारत की पूर्व भविष्यवाणी आखिरकार सच साबित हुई और कांग्रेस का हाल सभी दलों में सबसे खराब नजर आया। छत्रपति संभाजीनगर मनपा में वर्षों से शिवसेना और भाजपा की सत्ता रही है।
स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी माहौल कांग्रेस के पक्ष में जा सकता था, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इस चुनाव को बिना किसी ठोस चुनौ चुनौती के लड़ने का रास्ता चुना। न तो कोई आक्रामक रणनीति बनाई गई, न ही जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया। नतीजतन, पार्टी मतदाताओं में भरोसा पैदा करने में विफल रही।
जालना से कांग्रेस सांसद डॉ. कल्याण काले का कुछ क्षेत्र छत्रपति संभाजीनगर शहर में आता है, जहां कांग्रेस की पारंपरिक पकड़ मानी जाती रही है। लेकिन इस चुनाव में उनकी राजनीतिक पकड़ भी कमजोर साबित हुवी, उनके प्रभाव वाले प्रभागों से भी कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी, जो पार्टी के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
कांग्रेस ने शहर के कुल 115 वार्डों में से 71 वार्डों में उम्मीदवार उतारे, लेकिन जीत केवल एक वार्ड तक सीमित रही। वह जीत भी इसलिए संभव हो पाई क्योंकि उस वार्ड में एआईएमआईएम उम्मीदवार ने अंतिम समय पर नामांकन वापस ले लिया था। जिन वार्डों में कांग्रेस ने सीधा मुकाबला किया, वहां उम्मीदवारों की हालत बेहद खराब रही।
कांग्रेस शहर अध्यक्ष शेख यूसुफ की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि उन्होंने पार्टी के व्यापक हितों की बजाय अपने पुत्र को नगरसेवक बनाने पर अधिक ध्यान दिया प्रचार और संगठनात्मक समन्वय का बड़ा हिस्सा इसी प्रयास में सिमट गया।
विडंबना यह रही कि उनके पुत्र भी चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सके, और पार्टी को इसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला। वंचित बहुजन आघाड़ी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए गंभीर प्रयास किए थे।
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माना जा रहा है कि यदि यह गठबंधन होता, तो कांग्रेस की स्थिति इतनी कमजोर नहीं होती। लेकिन कांग्रेस पदाधिकारियों ने अधिक सीटों की मांग कर गठबंधन वार्ता में अडंगा डाल दिया।






