प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
Guru Tegh Bahadur: छत्रपति संभाजीनगर सामाजिक एकता और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले गुरु तेग बहादुर को इतिहास में ‘हिंद दी चादर’ की उपाधि प्राप्त है। इस पृष्ठभूमि में नांदेड में 24 व 25 जनवरी को 350वें शहीदी समागम का आयोजन किया जा रहा है, इसमें देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे।
इसी अवसर पर तेग बहादुर के महान कार्यों व बलिदान को स्मरण किया जा रहा है। उनका संपूर्ण जीवन समाज व मानवता की रक्षा के लिए समर्पित रहा, तत्कालीन शासको ने किए अन्याय के विरुद्ध जिस पत्र के माध्यम से आवाज उठाई गई, वही पत्र इतिहास में ‘जफरनामा’ के नाम से प्रसिद्ध है।
यह ऐतिहासिक जफरनामा मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुंचाने के उद्देश्य से कभी तत्कालीन औरंगाबाद लाया गया था। आज भी इसकी हस्तलिखित प्रति शहर के धावणी मोहल्ला, शहागंज स्थित भाई दयासिंग, भाई धरमसिंग (भाई हरिसिंग) गुरुद्वारे में सुरक्षित रखी गई है। यह एक प्रकार से मानव मुक्ति का घोषणापत्र माना जाता है, जिसे तेग बहादुर के सुपुत्र गुरु गोविंद सिंह ने औरंगजेब को लिखा था।
गुरुद्वारे के सदस्य सरदार हरिसिंग ने जानकारी देते हुए बताया कि जफरनामा का अर्थ है विजय का पत्र। मुगल शासक औरंगजेब ने सिखों पर किए अत्याचार, जबरन धर्म परिवर्तन व जजिया के माध्यम से अन्य धर्मों के लोगों के शोषण के खिलाफ यह एक निर्णायक आंदोलन था।
विरोध करने वालों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ती थी। इसीके विरुद्ध तेग बहादुर ने अपने शिष्यों के साथ शहादत दी, जो सिख इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। फारसी भाषा और लिपि में, छंदबद्ध काव्य शैली में लिखे गए इस पत्र में सिखों पर हुए अत्याचारों का स्पष्ट वर्णन है व यह संकल्प भी व्यक्त किया गया है कि किसी भी परिस्थिति में अन्याय को स्वीकार नहीं किया जाएगा, इसे औरंगजेब के कृत्यों की ‘श्वेत पत्रिका’ भी कहा जाता है।
कहा जाता है कि इसे पढ़ने के बाद औरंगजेब को अपने कृत्यों पर पश्चाताप हुआ व उसका हदय परिवर्तन हुआ। उसने अत्याचार को बढ़ावा देने वाले कानूनों को रद्द करने के आदेश जारी किए। साथ ही गुरु गोविद सिंह को गिरफ्तार न करने, उन्हें किसी प्रकार की हानि न पहुंचाने व आवश्यक सहयोग देने का भी फरमान जारी किया।
उसने गोविंद सिंह से मिलने की इच्छा भी व्यक्त की, लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। यह घटना ईस्वी सन् 1707 की है, जो औरंगजेब के जीवन का अंतिम वर्ष सिद्ध हुआ। जफरनामा का शहर से गहरा ऐतिहासिक संबंध है। पत्र लिखे जाने के समय औरंगजेब मराठा साम्राज्य को समाप्त करने के उद्देश्य से महाराष्ट्र में ही डेरा डाले हुए था।
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गोविंद सिंह के दो शिष्य दयासिंग व धरमसिंग यह पत्र लेकर दक्षिण भारत के प्रमुख मुगल केंद्र औरंगाबाद आए, उस समय औरंगजेब अहमदनगर में ठहरा हुआ था। दोनों शिष्य यहां से अहमदनगर गए व बादशाह से भेंट कर यह पत्र उसे सौंपा। यह ऐतिहासिक जफरनामा सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ दशम ग्रंथ में भी सम्मिलित है। आज भी इसकी हस्तलिखित प्रति छत्रपति संभाजीनगर के गुरुद्वारे में देखी जा सकती है।