अमेरिका ने लगाया 50% शुल्क, भारत में कपास किसानों की चिंता बढ़ी, केंद्र ने आयात शुल्क किया रद्द
Chhatrapati Sambhajinagar News: अमेरिका ने भारतीय कपड़ा उत्पादों पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया, जिसके बाद केंद्र ने 11 प्रतिशत आयात शुल्क रद्द किया, जिससे कपास किसानों की चिंता बढ़ गई।
- Written By: सोनाली चावरे
कपास पर अमेरिका ने लगाया 50% शुल्क (pic credit; social media)
Chhatrapati Sambhajinagar News: अमेरिका द्वारा भारतीय कपड़ा उत्पादों पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने के बाद केंद्र सरकार ने 11 प्रतिशत कपास आयात शुल्क 30 सितंबर तक रद्द करने का अहम फैसला लिया है। इस कदम से भारतीय कपड़ा उद्योग को सस्ता कच्चा माल उपलब्ध होगा, लेकिन कपास उत्पादक किसानों के लिए यह बड़ा संकट बन गया है।
उद्योग जगत ने सरकार से आयात शुल्क हटाने की मांग की थी। सरकारी सूत्रों के अनुसार यह कदम उद्योग को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए उठाया गया है। निर्णय के तुरंत बाद कपास बाजार में गिरावट देखने को मिली और थोक बाजार में 356 किलोग्राम कपास का विक्रय मूल्य प्रति गांठ 1,500 रुपए तक गिर गया। इससे सूत की कीमतों में भी प्रति किलो 2 से 3 रुपए की कमी आई।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में कपास का आयात लगातार बढ़ रहा है। अक्टूबर से नया कपास बाजार में आएगा और शुल्क मुक्त आयात के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार के सस्ते कपास की उपलब्धता से कीमतों में और गिरावट की संभावना है। अनुमान है कि अक्टूबर से दिसंबर 2025 तक कपास की कीमतें 7,400 से 8,400 रुपए प्रति क्विंटल तक रह सकती हैं।
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कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों ने सरकार से अपील की है कि समय पर गारंटी मूल्य खरीद केंद्र शुरू करें और किसानों से अधिकतम समर्थन मूल्य पर कपास खरीदी जाए। इस साल की कटाई में लागत और वास्तविक दाम देखने पर फसल जोखिम भरी हो गई है।
किसान सुखदेव वाहटुले ने कहा कि एमएसपी में बढ़ोतरी किए बिना फसल का नुकसान होगा। आयात शुल्क कम होने से कपास की कीमतें और गिर सकती हैं और इससे किसानों को गंभीर नुकसान होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी करने से ही किसानों को राहत मिल सकती है।
केंद्र सरकार ने फिलहाल आयात शुल्क रद्द कर उद्योग की मदद की है, लेकिन किसानों की सुरक्षा और स्थिर आमदनी सुनिश्चित करने के लिए एमएसपी बढ़ाना अनिवार्य माना जा रहा है। कपास बाजार में तेजी से बदलाव और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है।
