अमरावती विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम विवाद: पवन भगत का उपन्यास ‘ते पन्नास दिवस’ हटाने पर बवाल
अमरावती विश्वविद्यालय में उपन्यास हटाने का निर्णय, लेखक पवन भगत ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया है।
Amravati News: संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय के मराठी विभाग में पाठ्यक्रम को लेकर एक नया राजनीतिक और शैक्षणिक विवाद खड़ा हो गया है. बीए मराठी द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम से लेखक पवन भगत की चर्चित उपन्यास ते पन्नास दिवस वे पचास दिन को हटा दिया गया है.
इस उपन्यास में केंद्र की भाजपा सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति रहने का आरोप किया गया था. फोटो विवियह उपन्यास कोरोना काल और लॉकडाउन की पृष्ठभूमि पर आधारित है. कुछ प्राध्यापकों और सदस्यों का दावा है कि इसके कुछ अंश तत्कालीन मोदी सरकार के निर्णयों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.
9 दिसंबर को विद्या परिषद की बैठक में सबसे पहले इस पर आपत्ति जताई गई थी. तब उपकुलपति डॉ. मिलिंद बारहाते ने इसे पुनर्विचार के लिए अध्ययन मंडल के पास भेजा था. मराठी विभाग की प्रमुख डॉ. मोना चिमोटे के अनुसार अध्ययन मंडल ने गहन विचार के बाद स्पष्ट किया था कि उपन्यास में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है और इसे पाठ्यक्रम में बनाए रखने की सिफारिश की थी.
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2 अप्रैल को विद्या परिषद की बैठक में फिर से हंगामा हुआ. सर्वसम्मति न बनने पर मतदान कराया गया, जिसमें 23 विरुद्ध 8 के बहुमत से उपन्यास को हटाने का निर्णय लिया गया.ABVP ने दर्ज कराया विरोधविद्या परिषद की एक महिला सदस्य और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कुलसचिव को पत्र सौंपकर इस पुस्तक पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था.
पत्र में आपत्ति जताई थी कि उपन्यास में मोदी सरकार द्वारा लिए गए लॉकडाउन के फैसलों की अनुचित आलोचना की गई है. कोरोना काल की परिस्थितियों का चित्रण गलत और भ्रामक तरीके से किया गया है.अब धग उपन्यास का होगा अध्ययनकुलसचिव डॉ. अविनाश असनारे ने जानकारी दी है कि ते पन्नास दिवस को हटाकर अब प्रसिद्ध लेखक उद्धव शेलके द्वारा लिखित कालजयी उपन्यास धग को बीए भाग2 के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है.
यह निर्णय ग्रीष्मकालीन परीक्षा 2026 से ही लागू होगा. यह अघोषित आपातकाल हैउपन्यास के लेखक पवन भगत ने इस निर्णय को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया है. पाठ्यक्रम से किताब हटाना विचारों की हत्या है. सत्ता को किताबों से नहीं, बल्कि उन किताबों से पैदा होने वाली जागरूकता से डर लगता है. पहले प्रतिबंध घोषित किए जाते थे, अब अघोषित पाबंदियां लगाई जा रही हैं. यह एक तरह का अघोषित आपातकाल ही है.
