अमरावती में खरीफ बुआई पर मजदूर संकट, आसमान छूती मजदूरी से किसान दोहरी मार में
Amravati Labour Crisis: अमरावती जिले में खरीफ बुआई शुरू होते ही मजदूरों की कमी और बढ़ती मजदूरी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। महंगे इनपुट और बाहरी मजदूरों का खर्च खेती को और भारी बना रहा है।
- Written By: केतकी मोडक
किसान प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स - सोशल मिडिया)
Amravati Labour Shortage In Farming: अमरावती जिले में संतोषजनक बारिश के बाद खरीफ सीजन की बुआई ने रफ्तार तो पकड़ ली है, लेकिन किसानों के सामने अब मजदूरों का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। बुआई और अन्य महत्वपूर्ण कृषि कार्यों के लिए इन दिनों किसानों को मजदूरों की तलाश में दर-दर भटकना पड़ रहा है। लगातार बढ़ती मजदूरी, महंगे बीज, खाद और कीटनाशकों के कारण खेती की कुल लागत काफी बढ़ गई है, जिससे आम किसान चौतरफा आर्थिक तंगी से घिर गया है।
जानकारों के अनुसार, पहले गांवों में खेती के कामों के लिए पर्याप्त संख्या में स्थानीय मजदूर आसानी से मिल जाते थे। लेकिन अब ग्रामीण इलाकों के युवाओं का शहरों की तरफ तेजी से पलायन होने के कारण खेतों में काम करने वाले हाथ आधे रह गए हैं। किसानों का आरोप है कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले मुफ्त अनाज और सब्सिडी के कारण भी लोगों का कृषि मजदूरी की तरफ रुझान काफी कम हुआ है।
मध्य प्रदेश से आदिवासी मजदूरों को बुलाने की नौबत
स्थानीय स्तर पर मजदूरों की भारी किल्लत के कारण चांदूर बाजार, मोर्शी, वरुड़, अचलपुर समेत कई तहसीलों में मध्य प्रदेश से आदिवासी मजदूरों को विशेष रूप से बुलाकर काम कराया जा रहा है। इन बाहरी मजदूरों के परिवहन (आने-जाने), आवास और भोजन-पानी की व्यवस्था का अतिरिक्त खर्च भी स्थानीय किसानों को ही उठाना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत का बोझ लगातार बढ़ रहा है। समय पर खेती के काम पूरे करना अब किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। खेती को घाटे के इस दलदल से बचाने के लिए किसान अब सरकार से कुछ ठोस उपायों की मांग कर रहे हैं।
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बढ़ती मजदूरी दरें: एक नजर
- महिला मजदूर: ₹250 से ₹350 प्रतिदिन।
- पुरुष मजदूर: ₹350 से ₹650 प्रतिदिन।
- विशेष परिस्थिति: बारिश तेज होने और बुआई की हड़बड़ी के दौरान महिला मजदूरों की मजूरी ₹450 प्रतिदिन तक पहुंच जाती है, जो छोटे किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है।
रोजगार गारंटी योजना को खेती से जोड़ा जाए
किसान (कुर्ता, चांदूर बाजार) महेश तायडे ने कहा है कि “खेती में मजदूरों की समस्या अब बेहद गंभीर और बेकाबू हो चुकी है। मनमाफिक मजदूरी देने के बाद भी समय पर मजदूर नहीं मिलते, जिससे बुआई और निराई का काम पिछड़ जाता है। समय पर काम न होने से अंततः फसल का उत्पादन घटता है और लागत बढ़ती है, जिससे किसान दोहरे संकट में फंस गया है। सरकार को चाहिए कि वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को सीधे खेती के कामों से जोड़े, ताकि किसानों को राहत मिल सके।”
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मजबूरी में बच्चों को भी ले जाना पड़ता है खेत
किसान (गणोजा, चांदूर बाजार) सुरेश ईसल ने कहा है कि “छोटा किसान होने के बावजूद मुझे खेती के चक्र को पूरा करने के लिए समय-समय पर मजदूरों की जरूरत पड़ती है। बुआई के लिए मुंहमांगी मजदूरी देने पर भी मजदूर काम पर आने को तैयार नहीं होते। इस वजह से न चाहते हुए भी मुझे अपने घर के बुजुर्गों और स्कूल जाने वाले बच्चों को भी खेत में काम पर ले जाना पड़ता है, ताकि समय पर बुआई पूरी हो सके और बीज खराब न हों।”
