विदर्भ में कुदरत का 'लॉकडाउन', पारा 46°C के पार, मौसम विभाग ने भी जारी किया रेड अलर्ट

Vidarbha Heat Wave Red Alert Akola Amravati: विदर्भ में भीषण लू का प्रकोप, पारा 46 डिग्री के पार। मौसम विभाग ने अकोला, अमरावती और वर्धा के लिए जारी किया रेड अलर्ट।
Vidarbha Heat Wave Alert
अकोला-अमरावती और वर्धा के लिए 'रेड अलर्ट' जारी (प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स-AI)
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Vidarbha Heat Wave Alert: मई का महीना खत्म होते-होते महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में गर्मी ने रौद्र रूप अख्तियार कर लिया है। अकोला, वर्धा, अमरावती और नागपुर जैसे जिलों में सुबह 9 बजे से ही सूरज की किरणें बदन को झुलसाने लगती हैं। दोपहर होते-होते चलने वाली तेज और शुष्क पश्चिमी हवाओं (लू) ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। लगातार बढ़ते तापमान और उमस के कारण अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, उल्टी-दस्त और चक्कर आने वाले मरीजों की संख्या में भारी इजाफा देखा जा रहा है। स्थानीय प्रशासन ने गर्मी से बचाव के लिए प्रमुख चौराहों पर पीने के पानी और ओआरएस (ORS) की व्यवस्था शुरू कर दी है।

वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. सुभाष टाले के मुताबिक, विदर्भ में हर साल बढ़ती इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के पीछे गहरे पर्यावरणीय कारण छिपे हैं। डॉ. टाले ने चेतावनी देते हुए कहा, "ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे हवाओं का रुख और नमी का संतुलन बिगड़ गया है। अगर हमने अब भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया और ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले सालों में पूरे महाराष्ट्र को भीषण सूखे और जल संकट के महाविनाश का सामना करना पड़ेगा।"

'अर्बन हीट आइलैंड' के जाल में फंसे शहर

वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, विदर्भ की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है, जिससे यहाँ तक समुद्र की ठंडी हवाएं नहीं पहुंच पातीं। इसके ऊपर से बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें, सीमेंट की सड़कें और डामर के हाईवे इस आपदा को और गंभीर बना रहे हैं। विज्ञान की भाषा में इसे “अर्बन हीट आइलैंड” (Urban Heat Island) प्रभाव कहा जाता है, जहाँ कंक्रीट के ढांचे दिनभर सूरज की तपिश को सोखते हैं और रात के समय उसे वापस वायुमंडल में छोड़ते हैं। यही वजह है कि अब विदर्भ में रातें भी उतनी ही गर्म और बेचैन करने वाली होने लगी हैं।

खेती और पशुधन पर भी संकट के बादल

कम बारिश और सूखी जमीन के साथ-साथ वाहनों से होने वाले भारी प्रदूषण ने विदर्भ की आबोहवा को पूरी तरह गर्म कर दिया है। इस भीषण गर्मी का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों के पशुधन और फसलों पर भी पड़ रहा है। पानी के पारंपरिक स्रोत जैसे तालाब, कुएं और नदियां तेजी से सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पेयजल का संकट गहराने लगा है।

बचाव के लिए विशेषज्ञों ने सुझाए ये 5 उपाय

कंक्रीट के जंगलों को मात देने के लिए शहरी और ग्रामीण स्तर पर बड़े पैमाने पर स्थानीय छायादार पेड़ लगाए जाएं। पुराने तालाबों, झीलों और बावड़ियों को गहरा कर जल संचयन की क्षमता को बढ़ाया जाए। इमारतों की छतों पर सफेद रिफ्लेक्टिव रंग (White Paint) या ग्रीन कवर का इस्तेमाल किया जाए ताकि घर के भीतर का तापमान कम रहे। बढ़ते वाहन प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाए। प्रत्येक शहर के भीतर ग्रीन जोन और मियावाकी जंगलों का निर्माण अनिवार्य किया जाए।

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