Akola Kirtan Mahotsav: साधुसंत हमेशा भगवान से जग के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। भगवान प्रसन्न होने पर भी वे सत्संग की कामना करते हैं।
सत्संग भक्तों और संतों को जितना प्रिय है, उतना ही भगवान को भी अत्यंत प्रिय है। सत्संग से जीवन की परिपूर्णता हो जाती है। सभी इच्छाएं तृप्त हो जाती हैं, कोई इच्छा शेष नहीं रहती।
इसलिए हर भक्त को ऐसी सत्संग की कामना कर जीवन के परिपूर्ण मार्ग को सुगम बनाना चाहिए ऐसा हितोपदेश चैतन्य महाराज देगलूरकर ने दिया। गायत्री नगर के प्रांगण में चल रहा कार्यक्रम संत जगद्गुरु तुकाराम महाराज बीजोत्सव सेवा समिति, गायत्री नगर कौलखेड़ की ओर से प्रशांत महाराज ताकोते के मार्गदर्शन में चल रहे कीर्तन महोत्सव में पंढरपुर के कीर्तनकार चैतन्य महाराज देगलूरकर ने कीर्तन का सातवां पुष्प प्रस्तुत किया।
देव वसे चित्तीं। त्याची घडावी संगती। ऐसें आवडतें मना। देवा पुरवावी वासना, हरीजनासी भेटी, नहो अंगसंगें तुटी, तुका म्हणे जिणें, भलें संतसंघष्टणें… इस तुकोबा के अभंग पर कीर्तन प्रस्तुत किया गया।
देगलूरकर महाराज ने अपने कीर्तन में संत श्रेष्ठ तुकोबा की पांडुरंग भेंट की भक्तिमय कथा सुनाई। यदि चित्त मुक्त हो, तो भगवान निश्चित रूप से उसमें वास करते हैं। बल्कि भगवान भक्त के दास बनकर उनकी सेवा के लिए स्वयं उपस्थित हो जाते हैं।
भगवान भी हुए आनंदित देहू से एकादशी पर वारी करते हुए तुकोबा पंढरपुर पहुंचे। मंदिर में दर्शन के लिए बारी में खड़े हो गए। जिस विठुराया के दर्शन के लिए वे देहू से वारी कर मंदिर आए, उसे देखकर उन्हें अत्यंत आनंद हुआ।
विठोबा का दर्शन ही जन्म का सार्थक होना था। भगवान को देखने की इच्छा आज पूरी हो रही थी, इसलिए उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। पांडुरंग दर्शन से बढ़कर जीवन में कोई आनंद नहीं, अब जीवन में कोई अपेक्षा शेष नहीं रही।
उन्होंने भगवान के चरणों पर मस्तक रख दिया। तुकोबा का यह आनंद देखकर स्वयं भगवान को भी अत्यंत आनंद हुआ