MP Politics Inside Story: अर्जुन सिंह भी थे ‘पर्ची CM’! जानें 1980 के उस पॉलिटिकल ड्रामे की पूरी इनसाइड स्टोरी
MP Politics: मध्य प्रदेश की राजनीति काफी दिलचस्प है, कई किस्सें तो ऐसे हैं। जो बहुत कम लोग जानते हैं। इन्हीं में से एक है, 1980 में बहुमत के बावजूद भी शिवभानु सोलंकी को मुख्यमंत्री न बनाने का किस्सा।
- Written By: सजल रघुवंशी
अर्जुन सिंह और शिवभानु सिंह सोलंकी ( एआई जनरेटेड इमेज)
Arjun Singh CM Inside Story: ऐसा कहा जाता है कि जो नाम मीडिया में होता है या फिर जनता की सुर्खीयों में होता है। भारतीय जनता पार्टी उसे कभी भी मख्यमंत्री नहीं चुनती, अब ऐसा इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि जब 2023 के 3 राज्यों (राज्सथान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जोरदार प्रदर्शन कर जीत हासिल की, तब ऐसा माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी अपने मजबूत चेहरों को ही सीएम की गद्दी पर बैठाएगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ बल्कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में पर्यवेक्षकों के माध्यम से पर्ची में नाम तय कर मुख्यमंत्री चुने। जिस वजह से इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पर्ची सीएम भी कहा जाने लगा।
अब मध्य प्रदेश के मौजूदा सीएम डॉ मोहन यादव को पर्ची सीएम कहा जाता है। लोग कहते हैं कि वह विधायकों के समर्थन से नहीं दिल्ली से आई पर्ची से सीएम बने। अब इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन मध्य प्रदेश में शायद ही कोई मुख्यमंत्री विधायकों की मर्जी से बना हो, अगर पर्ची चली भी तो पहली बार नहीं। गौरतलब है कि कांग्रेस के दिग्गज अर्जुन सिंह भी पर्ची से ही सीएम बने थे, अब क्या है अर्जुन सिंह के पहली बार सीएम बनने की इनसाइड स्टोरी आइए जानते हैं।
पर्ची से ही बने थे अर्जुन सिंह सीएम
दरअसल, मध्य प्रदेश की सियासत में अब तक के सबसे ताकतवर नेता रहे अर्जुन सिंह भी पहली बार दिल्ली की पर्ची पर ही सीएम बने थे। अन्यथा तब विधायकों का समर्थन आदिवासी नेता शिवभानु सिंह सोलंकी के पास था, विधायकों के समर्थन के बाद भी सीएम की कुर्सी न मिलने पर सोलंकी ने यहां तक कह दिया था कि ‘कांग्रेस ने आदिवासी के सामने से परोसी थाली छीन ली’।
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जब अर्जुन सिंह ने चला आदिवासी कार्ड
1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर बड़ा संघर्ष शुरू हो गया। अर्जुन सिंह लगातार छठी बार विधायक बनकर आए थे और सीएम बनना चाहते थे। दूसरी ओर श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल और प्रकाशचंद्र सेठी भी प्रभावशाली नेता थे। अर्जुन सिंह ‘शुक्ला बंधुओं’ को रोकने के लिए दिल्ली में अपनी पकड़ मजबूत करने लगे। उन्होंने इंदिरा गांधी और संजय गांधी से करीबी बढ़ाई। श्यामाचरण शुक्ल के कांग्रेस से बाहर जाने के बाद अर्जुन सिंह ने आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा उछाला। इससे शुक्ला बंधु कमजोर पड़े और शिवभानु सिंह सोलंकी, कमलनाथ दावेदार बने और अर्जुन सिंह ने खुद दावेदारी की और तीसरे दावेदार हुए। अंत में तय हुआ कि विधायक दल की वोटिंग से मुख्यमंत्री चुना जाएगा।
अर्जुन सिंह और शिवभानु सिंह सोलंकी
जीती बाजी ऐसे हारे शिवभानु सोलंकी
मुख्यमंत्री चयन के लिए दिल्ली से प्रणव मुखर्जी पर्यवेक्षक बनकर भोपाल पहुंचे। पीसीसी दफ्तर में शिवभानु सोलंकी, अर्जुन सिंह और कमलनाथ के नाम के तीन बक्से रखकर विधायकों से गुप्त मतदान कराया गया। शुरुआती संकेतों में शिवभानु सोलंकी भारी पड़ते दिखे क्योंकि आदिवासी विधायक और शुक्ला समर्थक उनके साथ चले गए थे। वोटों की गिनती शुरू होने से पहले दिल्ली से फोन आया और मतगणना रोक दी गई। प्रणब मुखर्जी बॉक्स दिल्ली ले गए, जहां से संदेश आया कि अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री होंगे। कहा गया कि कमलनाथ के वोट भी अर्जुन सिंह के खाते में जोड़ दिए गए। हालांकि, तीनों नेताओं को मिले वोटों का आंकड़ा कभी सार्वजनिक नहीं हुआ।
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अर्जुन सिंह से चिढ़ते थे सोलंकी?
डिप्टी सीएम पद के साथ शिवभानु को वित्त विभाग दिया गया था। कांग्रेस पार्टी का निर्देश मान शिवभानु सोलंकी डिप्टी सीएम के पद पर मान तो गए लेकिन उनकी खीझ कभी नहीं गई। वह कहते थे कि कांग्रेस ने आदिवासी के सामने से परोसी थाली छीन ली। एक बार तत्कालीन जनसंपर्क संचालक सुदीप बनर्जी उनके पास अपने विभाग का बजट बढ़वाने के लिए गए तो सोलंकी ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया। उन्होंने कहा कि आप मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के अलावा करते ही क्या हैं? सोलंकी ने कहा कि मध्य प्रदेश की आबादी 4 करोड़ है और प्रति व्यक्ति एक रुपये के हिसाब से आपके विभाग का बजट पर्याप्त है। उस समय जनसंपर्क विभाग का बजट करीब 4 करोड़ रुपये ही था। शिवभानु सोलंकी 1985 का चुनाव भी जीते थे। उस समय मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन उन्हें डिप्टी सीएम का पद नहीं दिया गया।
