सागर में 108 कलशों से हुआ महाअभिषेक, ‘अस्वस्थ’ हुए भगवान जगन्नाथ; अब 15 दिन अनसर गृह में रहेंगे
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- Reported By: सरजू पटेल | Edited By: सजल रघुवंशी
भगवान जगन्नाथ का महाअभिषेक (सोर्स- सोशल मीडिया)
Lord Jagannath Mahaabhishek Sagar: सागर जिले के गढ़ाकोटा स्थित प्राचीन श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर में स्नान पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सनातन परंपराओं के अनुरूप पूरे धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और “जय जगन्नाथ” के जयघोष के बीच भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से महाअभिषेक किया गया।
पंचामृत, गंगाजल, चंदन, पुष्प और विभिन्न औषधीय द्रव्यों से संपन्न इस विशेष अभिषेक में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। पूरे मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला और श्रद्धालुओं ने भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
महाअभिषेक के बाद 15 दिनों के लिए ‘अस्वस्थ’ हुए भगवान
स्नान पूर्णिमा के उपरांत भगवान जगन्नाथ के ‘अस्वस्थ’ होने की प्राचीन धार्मिक परंपरा का भी विधिवत पालन किया गया। महामंडलेश्वर एवं जगदीश मंदिर शाला के महंत श्री हरिदास जी ने बताया कि सनातन मान्यताओं के अनुसार महाअभिषेक के बाद भगवान को ज्वर हो जाता है। इसी कारण उन्हें अगले 15 दिनों के लिए ‘अनसर गृह’ यानी विश्राम कक्ष में विराजमान किया जाता है। इस अवधि में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन पूरी तरह बंद रहेंगे और केवल सेवायत पुजारी ही उनकी नियमित सेवा एवं पूजा-अर्चना करेंगे।
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वैद्य करेंगे उपचार, औषधीय काढ़ा और सात्विक भोग होगा अर्पित
धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान को इस दौरान एक रोगी की तरह सेवा प्रदान की जाती है। वैद्य उनकी प्रतीकात्मक नाड़ी परीक्षण की प्रक्रिया पूरी करते हैं और आयुर्वेदिक पद्धति से उपचार किया जाता है। भगवान को जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष औषधीय काढ़ा अर्पित किया जाता है, जबकि भोग में केवल हल्का और सात्विक भोजन ही समर्पित किया जाता है। यह परंपरा भगवान के प्रति सेवा, समर्पण और वात्सल्य भाव का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है, जो सदियों से चली आ रही है।
नवयौवन दर्शन के बाद निकलेगी भव्य रथयात्रा
धार्मिक मान्यता के अनुसार 15 दिनों के विश्राम और उपचार के बाद भगवान जगन्नाथ पूर्ण स्वस्थ होकर नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे। इसके बाद मंदिर से भव्य रथयात्रा का आयोजन किया जाएगा, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे।
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गढ़ाकोटा की यह प्राचीन परंपरा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि भगवान को मानव स्वरूप मानकर उनकी सेवा, देखभाल और समर्पण भाव से पूजा करना सनातन संस्कृति की अनूठी पहचान है। हर वर्ष यह पर्व श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और धार्मिक विश्वास का केंद्र बनकर क्षेत्र में आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करता है।
