

Reverse Parenting: बदलते दौर में पेरेंटिंग के मायने बदल रहे हैं। आजकल रिवर्स पेरेंटिंग का ट्रेंड चर्चा में है जहां बच्चे छोटी उम्र में ही माता-पिता की भावनात्मक या घरेलू जिम्मेदारियां संभालने लगते हैं। हालांकि यह सुनने में सुखद लग सकता है लेकिन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह बच्चे के मानसिक विकास के लिए एक खतरनाक संकेत भी हो सकता है।
साधारण शब्दों में कहें तो जब माता-पिता और बच्चों की भूमिकाएं आपस में बदल जाती हैं तो उसे रिवर्स पेरेंटिंग या पैरेंटिफिकेशन (Parentification) कहा जाता है। इसमें बच्चा अपने माता-पिता के लिए एक सलाहकार, रक्षक या केयरटेकर की भूमिका निभाने लगता है। यह अक्सर उन घरों में देखा जाता है जहाँ माता-पिता किसी मानसिक तनाव, बीमारी या आपसी झगड़ों से जूझ रहे होते हैं।
शुरुआती तौर पर रिवर्स पेरेंटिंग के कुछ फायदे नजर आ सकते हैं। ऐसे बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा समझदार, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बन जाते हैं। वे मुश्किल समय में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बहुत डरावना है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब एक बच्चा अपनी उम्र से बड़ा बोझ उठाता है तो उसका बचपन कहीं खो जाता है। इसके निम्नलिखित नुकसान हो सकते हैं।
यह जरूरी है कि माता-पिता अपनी समस्याओं के लिए बच्चों को इमोशनल सपोर्ट का जरिया न बनाएं। बच्चों को उनका बचपन जीने दें। उन्हें जिम्मेदार जरूर बनाएं लेकिन उन्हें अपनी उम्र के हिसाब से गलतियां करने और सीखने का मौका दें। अगर आपका बच्चा जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गया है तो यह समय उसे फिर से बच्चा बनाने का है न कि उसकी मैच्योरिटी पर गर्व करने का।
संस्कार और जिम्मेदारी अच्छी बात है लेकिन इसकी कीमत बच्चे की मानसिक शांति नहीं होनी चाहिए। एक स्वस्थ समाज के लिए बच्चों का बच्चा बने रहना बहुत जरूरी है।