नई दिल्ली : भक्ति का दूसरा नाम मीराबाई कहा जाये तो गलत नहीं होगा। हम सब जानते है कि भगवान कृष्ण की भक्ति में खोई मीराबाई सबके लिए एक आदर्श है। वह पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में लीन थी, आज भी वह हम सभी के लिये एक प्रेरणा है। मीरा बाई के जन्म समय का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इनका जन्म लगभग 1448 का है।
हर साल आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को मीराबाई के जयंती के रूप में मनाया जाता है। आज 20 अक्टूबर 2021 के दिन मीरा बाई जयंती है। आपको बता दें कि मीराबाई बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में लीं थी। उन्होंने अपने पूरे जीवन में भगवान कृष्ण की भक्ति की है। आज भी लोगों के दिल के भक्ति के किस्से बसे हुए है। आज मीरा बाई के जयंती के अवसर पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें बता रहे है….
मीराबाई जोधपुर, राजस्थान के मेड़वा राजकुल की राजकुमारी थी। ये अपने पिता रतन सिंह की एकमात्र संतान थी। मीराबाई जब छोटी थीं तो उनकी मां का देहांत हो गया, इसके बाद उनके दादा राव दूदा उन्हें मेड़ता ले आए और यहीं पर उनकी देखरेख में मीराबाई का पालन-पोषण हुआ। मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण-भक्ति में रम गया था।
इन्होंने बालपन से ही अपने मन में कृष्ण की छवि को बसा लिया था और बचपन से युवावस्था व बाकी पूरे जीवन भर उन्हें ही अपना सबकुछ मानकर उनकी भक्ति में लीन रहीं। मीराबाई ने कृष्ण को ही अपने पति के रुप में स्वीकार लिया था इसलिए वे विवाह नहीं करना चाहती थी, इसके बाद उनकी इच्छा के विरुद्ध राजकुमार भोजराज के साथ उनका विवाह कर दिया गया। फिर भी उनकी कृष्ण के प्रति भक्ति काम नहीं हुई।
मीराबाई के कृष्णभक्त बनने की कहानी भी बड़ी रोचक है। बचपन में हमारा मन बेहद कोमल और नाजुक होता है। बचपन में हमें जो भी कहा जाता है वही हम सच मान के चलते है। मीराबाई के कृष्ण भक्त बनने के पीछे एक कथा मिलती है, जिसके अनुसार एक समय की बात है जब उनके पड़ोस में किसी धनवान व्यक्ति के यहां बारात आई थी।
उस समय मीराबाई बाल्यकाल की अवस्था में ही थी। सभी स्त्रियां छत पर खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीराबाई भी बारात देखने के लिए छत पर आ गई बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है इस पर मीराबाई की माता ने उपहास में ही भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कह दिया कि यही तुम्हारे वर हैं, यह बात मीराबाई के बालमन में एक गांठ की तरह समा गई और वे कृष्ण को ही अपना पति मानने लगी।
मीराबाई की कहानी बेहद प्रेरणादायक है। मीराबाई के विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहांत हो गया जिसके बाद वे और भी ज्यादा कृष्ण भक्ति में लीन होती चली गईं। मीराबाई को उनके पति के साथ सती करना चाहा लेकिन वे इसके लिए नहीं मानी क्योंकि वे कृष्ण को अपना स्वामी मानती थी। कहा जाता है कि इसी कारण उन्होंने अपना श्रृंगार भी नहीं उतारा। इसके बाद मीराबाई की अनुपस्थिति में ही उनके पति का अंतिम संस्कार किया गया। यही वो दौर था जब मीराबाई कृष्ण के भक्ति में और भी ज्यादा लीन होती है।
जब मीराबाई के पति का देहांत होने के बाद उनकी भक्ति दिनों-दिन बढ़ती चली गई। वे मदिर में जाकर इतनी लीन हो जाती थी कि श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने घंटो तक नाचती रहती थी। इसी कारण मीराबाई की कृष्ण भक्ति उनके पति के परिवार को अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए उन्हें कई बार मारने का प्रयास भी किया गया कभी विष देकर तो कभी जहरीले सांप के द्वारा। परंतु श्रीकृष्ण की कृपा से मीराबाई को कुछ नहीं हुआ और वो निरंतर कृष्ण भक्ति करती रही।
मीराबाई को मारने का प्रयास किया, इसके बाद वे वृंदावन और फिर वहां से द्वारिका चली आई। इसके बाद वे साधु-संतों के साथ रहने लगी व कृष्ण की भक्ति में रमी रहीं। मीराबाई की मृत्यु के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन भर भगवान कृष्ण की भक्ति की और अंत समय में भी वे भक्ति करते हुए कृष्ण की मूर्ति में समा गई थी। इस तरह मिटा बाई की भगवान श्री कृष्ण में जा समाई।