
सीमा कुमारी
नई दिल्ली: होली का त्यौहार बस आने को ही है। रंग और उमंग से भरी जिस होली का इंतजार लोगों को पूरे साल बना रहता है, उसका एक अलग ही रंग ब्रज मंडल में देखने को मिलता है। लगभग 40 दिनों तक मनाए जाने वाले फाग पर्व को यहां पर अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है, होली खेलने के लिए कई श्रद्धालु ब्रज में जाते हैं और अपने आराध्य के साथ होली खेलते हैं। बांके बिहारी मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु आराध्य के दर्शन करने के लिए जाते हैं। इस दौरान मंदिर को पीले रंग से सजाया जाता है और ठाकुर बांके बिहार जी को भी पीले रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं। कई दिनों पहले ही मंदिर में तैयारियां भी शुरू हो जाती है।
ठाकुर जी के साथ होली के खेलने की शुरुआत का नजारा देखने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। मंदिर के प्रांगण में उड़ता गुलाल भक्तों के ऊपर गिरता है, तो इसे ईश्वर के प्रसाद के तौर पर समझा जाता है। राधा-कृष्ण के प्रेम स्वरूप खेली जाने वाली होली बरसाना, नंद गांव, मथुरा सहित वृंदावन जैसे कई मंदिरों में खेली जाती है।
रंग और गुलाल की होली के साथ इस पर्व पर ‘होलिका दहन’ के स्थलों पर पेड़ का डांढ़ा भी लगाया जाता है। यह पेड़ की लकड़ी के टुकड़ा होता है, जिसके पास में ‘होलिका’ सजाई जाती है और ‘होलिका दहन’ तक हर लकड़ी डाली जाती है। फिर यह उत्सव लगातार 40 दिनों तक चलता है। आपको बता दें कि ब्रज की होली दुनियाभर में बहुत ही मशहूर है। खासकर यहां की ‘लट्ठमार होली’ देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
यही कारण है कि यहां पर खेली जाने वाली लड्डू और ‘लट्ठमार होली’ को न सिर्फ खेलने बल्कि देखने के लिए हजारों-हजार लोग देश-विदेश से पहुंचते हैं। आइए जानें बरसाने की उस दिव्य होली और उससे जुड़ी रोचक कथा के बारे में –
जानकारों के अनुसार, बरसाना की ‘लट्ठमार होली’ की चर्चा किए बगैर होली की बात अधूरी मानी जाती हैं। दुनिया भर में प्रसिद्ध बरसाना की रंगीली गली में मनाई जाने वाली ‘लट्ठमार होली’ इस साल 28 फरवरी 2023 को मनाई जाएगी। बरसाना की लट्ठमार होली को राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम का प्रतीक माना जाता हैं। मान्यता है कि द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा एवं गोपियों के साथ इस होली की परंपरा की शुरुआत की थी। तब से चली आ रही लट्ठमार होली को खेलने और इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पर पहुंचते हैं। लट्ठमार होली को खेलने के लिए आज भी नंदगांव के पुरुष और बरसाने की महिलाएं ही भाग लेती हैं। जिसमें महिलाएं पुरुषों पर लाठियां भांजती हैं तो वहीं पुरुष उनसे बचने के लिए ढाल का प्रयोग करते हैं।
बरसाना में लट्ठमार की तरह ‘लड्डू मार होली’ भी विश्व प्रसिद्ध है. लड्डू मार होली हर साल लाडली जी के मंदिर में आयोजित की जाती हैं। यह होली लट्ठमार होली से एक दिन पहले होती है, जिसके लिए लाडली जी के महल से भगवान श्रीकृष्ण के नंदगांव में फाग का निमंत्रण भेजा जाता हैं। उसके बाद नंदगांव से पुरोहित रूपी सखा राधा रानी के महल में स्वीकृति का संदेश भेजा जाता हैं। मान्यता है कि वहां पुरोहित या फिर कहें पंडा का भव्य स्वागत होता है और उसे खाने के लिए ढेर सारे लड्डू दिए जाते हैं। मान्यता है कि इतने सारे लड्डू को देखकर वह खुशी के मारे पागल हो जाता है और उन लड्डुओं को खाने की बजाय लुटाने लगता हैं। तब से यह परंपरा हर साल निभाई जाती है और इस लड्डू मार होली को खेलने से पहले श्री जी मंदिर में लाडली जी को लड्डू अर्पित किए जाते हैं।
मान्यताएं हैं कि, जब नंदगांव से आए पुरोहित को खाने के लिए लड्डू दिए, तो उसी समय कुछ गोपियों ने पुरोहित को गुलाल लगा दिया। चूंकि उस समय पंडे के पास गोपियों को लगाने के लिए गुलाल नहीं था, तो उसने गोपियों पर पास रखे लड्डू ही फेंकने शुरू कर दिए। मान्यता है कि तभी से लड्डू मार होली खेली जाने लगी। लड्डू मार होली वाले दिन देखते ही देखते कई टन लड्डू लुटा दिए जाते हैं। इस दिन राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के रंग में रंगने और लड्डू प्रसाद को पाने के लिए लिए हजारों की संख्या पर बरसाना पहुंचते हैं।






