क्यों होता है नवरात्रि में गरबा, जानिए इसका पारंपरिक महत्व
- Written By: वैष्णवी वंजारी
सीमा कुमारी
नवभारत डिजिटल टीम: पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन ‘शारदीय नवरात्रि’ की शुरुआत होती है। इस साल नवरात्रि (Navaratri 2023) का शुभारंभ आज यानी 15 अक्टूबर, 2023 रविवार से हो रहा है। नवरात्रि के दौरान साधक माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं साथ ही व्रत भी रखते हैं। नवरात्रि के दौरान गरबा खेलने का भी प्रचलन है। जितना रोचक ये खेल लगता है उतना ही रोचक इसके पीछे का इतिहास भी है। ऐसे में आइए जानें गरबे का धार्मिक महत्व।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, भारत में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया खेलने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। पहले ये खेल केवल गुजरात और राजस्थान तक ही सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और अब इस बड़े ही धूमधाम से पूरे भारत में खेला जाता है। गरबा शब्द असल में संस्कृत शब्द गर्भ-दीप से बना है। यहां गर्भ नारी की सृजन शक्ति का प्रतीक है। गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है, जो आज भी चलन में है।
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सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में कई छेद किए जाते हैं। इसके बाद एक दीप प्रज्वलित करके इसके अंदर रखा जाता है। साथ ही एक चांदी का सिक्का भी रखा जाता है। इस दीपक को ही दीप गर्भ कहा जाता है, जिसके आस-पास लोग गरबा खेलते हैं। माना जाता है कि गरबा करने से माता रानी प्रसन्न होती हैं।
इसलिए दीप गर्भ की स्थापना के पास महिलाएं और पुरुष रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर माता शक्ति के समक्ष नृत्य करती हैं। गरबा के दौरान महिलाओं द्वारा 3 तालियां भी बजाई जाती हैं जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित मानी जाती है। 3 तालियां बजाकर तीनों देवताओं का आह्वान किया जाता है। साथ ही गरबा के दौरान चुटकी, डांडिया और मंजीरों का उपयोग किया जाता है। ताल से ताल मिलाने के लिए स्त्री और पुरुष समूह बनाकर नृत्य करते हैं।
वैसे तो डांडिया और गरबा दो अलग तरह के नृत्य हैं। लेकिन दोनों का नाता माता दुर्गा और नवरात्रि से जुड़ा है। हालांकि डांडिया और गरबा में एक विशेष अंतर है। गरबा मां दुर्गा की आरती से पहले किया जाता है, जबकि डांडिया आरती के बाद खेला जाता है।
डांडिया के लिए प्राॅप के तौर पर रंग बिरंगी डांडिया स्टिक की जरूर होती है, जबकि गरबा के लिए किसी चीज की जरूरत नहीं होती। लोग अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर ताली बजाते हुए गरबा करते हैं और गरबा ज्योत के आसपास नृत्य करते हैं।
