
सीमा कुमारी
नई दिल्ली: सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को समर्पित महीना होता हैं। इस महीने में भगवान भोलेनाथ के निमित्त पूजा-पाठ, जलाभिषेक, दुग्ध अभिषेक, व्रत आदि धार्मिक कार्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि सावन का महीना यदि भगवान शिव के निमित्त कोई भी धार्मिक कार्य किया जाए तो भगवान भोलेनाथ की कृपा उन पर सदैव बनी रहती हैं। उनके सभी रुके हुए कार्य पूरे हो जाते हैं। क्योंकि, भगवान शिवजी सभी देवी-देवताओं में अत्याधिक भोले माने जाते हैं।
वे अपने भक्तों से आसानी से प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वरदान प्रदान कर देते हैं। भोलेनाथ ही एक ऐसे देव हैं, जिन्हें कोई 56 भोग नहीं चढ़ाया जाता है। महादेव को खुश करने के लिए एक लोटा जल और कुछ बेलपत्र के पत्ते ही काफी होते हैं। इतने साधारण और भोले स्वभाव होने के बावजूद भी शिवजी को सती से विवाह उनके पिता के विरुद्ध जाकर करना पड़ा था। राजा दक्ष भगवान शिव शंकर बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। वह अपनी बेटी का विवाह उनसे कभी नहीं करवाना चाहते थे। यही वजह है कि विवाह के बाद भी शिवजी को जमाई के रूप में राजा दक्ष ने उन्हें कभी नहीं अपनाया था। तो आइए जानें आखिर ऐसा क्यों था कि दक्ष शिवजी को इतना नापसंद करते थे।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भोलेनाथ अक्खड़ और योगी थे, जिनका रंग-रूप और रहन-सहन का तरीका भी अन्य देवताओं से बिल्कुल अलग था। जहां अन्य देव सोने, हीरे-मोती के गहने और रेशम के कपड़े पहन कर महलों में रहते थे। वहीं इसके उलट भगवान शिव शरीर पर भस्म लगाए, गले में सांप लिपटे बर्फ से घिरे कैलाश पर्वत और जंगलों में अपना बसेरा बनाए हुए थे। ऐसे में राजा दक्ष शिवजी को अपनी बेटी सती के योग्य नहीं मानते थे। उन्हें लगता था कि उनकी बेटी जो महलों में पली-बढ़ी और दास-दासियों से घिरी रही वह कैसे एक अक्खड़ शिव के साथ रहेंगी। लेकिन माता सती ने शिवजी को पाने के लिए कठोर तप और पूजा किया।
राजा दक्ष ने माता सती का स्वयंवर आयोजन किया और उसमें भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। हालांकि सती ने महादेव को अपना पति मान लिया था। उन्होंने शिवजी को पाने के कठोर तप और पूजा किया। सती ने भगवान शिव का नाम लेते हुए स्वयंवर में पृथ्वी पर वरमाला डाल दी। तब स्वयं शिव वहां पर प्रकट होकर सती के द्वारा डाली गई वरमाला को पहन लिया था। इसके बाद शिव जी ने सती को अपनी पत्नी स्वीकार कर वहां से चल गए। यह बात राजा दक्ष को बिल्कुल पसंद नहीं आई कि उनकी इच्छा के विपरीत सती का विवाह शिव के साथ हुआ।
प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक, दक्ष प्रजापति को ब्रह्मा जी ने मानस पुत्र के रूप में पैदा किया था। वे विष्णु जी के भी परम भक्त थे। कहते हैं कि ब्रह्मा जी के 5 सिर हुआ करते हैं। इसमें से 3 सिर वेद पाठ करते थे लेकिन बाकी दो सिर वेद को भला-बुरा कहा कहते थे। इसी से नाराज होकर शिवजी ने एक दिन ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया। दक्ष प्रजापति अपने पिता ब्रह्मा के सिर को काटने की वजह से शिवजी से क्रोधित रहने लगे। हालांकि इस कथा को ज्यादा नहीं माना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, एक यज्ञ का आयोजन था जिसमें सभी देवी-देवता पहुंचे हुए थे। उस यज्ञ में शामिल होने के लिए राजा दक्ष भी पहुंचे तब उनके स्वागत में वहां मौजूद सभी लोग और देवी-देवता खड़े हो गए लेकिन, शिवजी ब्रह्मा जी के साथ बैठे रहे। इस बात को लेकर दक्ष काफी अपमानित महसूस करने लगे। इसी घटना के बाद से राजा दक्ष ने भगवान शिव को कभी पसंद नहीं किया।
ज्योतिषियों के मुताबिक, माता सती और भगवान शिव के विवाह के काफी समय बाद राजा दक्ष ने कनखल में एक यज्ञ का आयोजन करवाया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवता को बुलाया लेकिन अपनी बेटी और जमाई को नहीं बुलाया। जब माता सती को इस बात का पता चला तो वह बिना बुलाए उस यज्ञ में शामिल होने के लिए चली गई। यज्ञ स्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शिवजी का अपमान किया, जिसे सती सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ की अग्नि कुंड में कूदकर खुद को भस्म कर लिया।
इस बाद का पता जब भगवान शिव को चला चला तो हर जगह त्राहिमाम मच गया। भगवान शिव ने वीरभद्र को उत्पन्न कर उसके द्वारा उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भगवान शिव ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर यज्ञ को पूरा कराया।






