विवाह में आ रही हो अड़चन, तो शरद पूर्णिमा के दिन करें ये उपाय, विवाह के साथ संतान प्राप्ति के भी बनेंगे योग
- Written By: वैष्णवी वंजारी
सीमा कुमारी
नवभारत डिजिटल टीम: सनातन धर्म में ‘शरद पूर्णिमा’ (Sharad Purnima 2023) का विशेष महत्व है। इस साल यह पावन तिथि यानी शरद पूर्णिमा 28 अक्टूबर दिन शनिवार को पड़ रही है। शरद पूर्णिमा का चांद मन को शीतलता देता है। शरद पूर्णिमा का सनातन धर्म में विशेष महत्व माना गया है। भगवान श्री कृष्ण की रासलीला हो या फिर भगवान कार्तिकेय का जन्म दोनों इसी तिथि को हुए। जिस कारण से इस तिथि का काफी महत्व है।
इंदौर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित कपिल महाराज के अनुसार, अगर आप भी योग्य पति या संतान की कामना रखते हैं तो ये शरद पूर्णिमा आप के लिए बेहद खास है। क्योंकि,इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से आपको इन समस्याओं से राहत मिल सकती है। आइए जानें इन उपायों के बारे में-
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ज्योतिष का कहना है कि, जिन कन्याओं का विवाह नहीं हुआ है या विवाह में अड़चन आ रही है। वे कन्याएं अगर इस दिन भगवान कृष्ण का पूजा-अर्चना करें तो योग्य वर की प्राप्ति के योग बनते है। क्योंकि,इस शुभ तिथि के दिन ही भगवान कार्तिकेय का भी जन्म हुआ था। इसलिए, इस दिन को कार्तिक पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा, जिन लोगों को संतान नहीं है या जो भी लोग संतान की कामना रखते है। अगर इस दिन भगवान कार्तिकेय का विधिवत पूजा अर्चना करें तो संतान के भी योग बनते है।
शरद पूर्णिमा का महत्व
ज्योतिष गुरु पंडित कपिल महाराज के मुताबिक, शरद पूर्णिमा की वैज्ञानिक और धार्मिक मान्यता दोनों ही है। वैज्ञानिक मान्यता यह है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा धरती के बहुत करीब रहता है। जिसके कारण चंद्रमा से निकलने वाली जो अमृत धाराएं है। वह हमारे शरीर में प्रविष्ट करती हैं जिससे हमारा शरीर निरोगी काया को प्राप्त करता है। इसलिए अधिकांश लोग शरद पूर्णिमा वाले दिन अपने घर की छत पर खीर बनाकर रखते हैं, ताकि चंद्रमा की किरणें खीर पर पड़े और हमारे शरीर में रोगों से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़े। जिस कारण खीर को सुबह खाया जाता है। जिससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है।
पंडित कपिल महाराज बताते हैं कि, शरद पूर्णिमा को लेकर सबसे बड़ी आध्यात्मिक बात तो यही है कि इस दिन भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण ने महारास रचाई थी। महारास का अर्थ है आत्मा और परमात्मा का मिलन। इसी दिन भगवान शिव को एक नया नाम भी मिला था और वह नाम है गोपेश्वर महादेव, क्योंकि भगवान शिव जी महारास का आनंद लेने के लिए गोपी का रूप धारण करके पहुंचे थे। इसलिए इस दिन का बड़ा महत्व है।
