
भगवान जगन्नाथ को क्यों लगाते है नीम का भोग (सौ. डिजाइन फोटो)
ओडिशा के पुरी जिले में स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा की शुरुआत 27 जून से होने वाली है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंच रहे है। जैसा कि सब जानते है कि यात्रा यहां पर भव्य होती है जिसमें भगवान जगन्नाथ के साथ ही बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथ यात्रा शुरू होती है। जगन्नाथ रथयात्रा का शुभारंभ जगन्नाथ मंदिर से होता है तो वहीं पर गुंडिचा मंदिर पहुंचते है। भगवान अपनी मौसी के घर भ्रमण के लिए जाते है। इस रथयात्रा में भक्त पहुंचकर भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचकर पुण्य की प्राप्ति करता है।
भगवान जगन्नाथ की पूजा से जुड़ी कई परंपराएं है जिसमें कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ को नीम का भोग लगाया जाता है। इसके पीछे खास कहानी जुड़ी है चलिए जानते है…
भगवान जगन्नाथ की पूजा से जुड़ी परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ को कड़वे नीम की पत्तियों का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से प्रचलित है जो लगातार चली आ रही है। भगवान को मीठे के स्थान पर कड़वा नीम क्यों चढ़ाया जाता है इसके लिए पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर के पास एक वृद्धा महिला रहती थी, जो भगवान को अपने पुत्र के रूप में मानती थी। वह प्रतिदिन देखती थी कि भगवान को 56 प्रकार के विविध और भारी भोजन चढ़ाए जाते हैं। एक दिन उसने सोचा कि इतना सारा भोग ग्रहण करने के बाद उसके बेटे को पेट दर्द हो सकता है इसके लिए महिला ने नीम का चूर्ण बनाया था।
आपको बताते चलें कि, जैसे ही महिला भगवान को नीम का चूर्ण अर्पित करने पहुंच मंदिर के बाद सैनिक ने महिला का अनादर कर दिया। भगवान को चूर्ण देने पहुंची सैनिकों ने हाथ से बना नीम का चूर्ण छीनकर फेंक दिया। इस बात पर महिला काफी दुखी हुई और घर लौट आई।उस रात भगवान जगन्नाथ ने पुरी के राजा के स्वप्न में दर्शन दिए और पूरी घटना की जानकारी दी। भगवान ने राजा से कहा कि उन्होंने एक सच्ची भक्त का अपमान सहन किया है और यह अनुचित है। उन्होंने राजा को आदेश दिया कि वह स्वयं उस महिला के घर जाकर क्षमा मांगे और उसी नीम के चूर्ण को फिर से बनवाकर भगवान को अर्पित करे।
आपको बताते चलें, भगवान के आदेश का पालन राजा ने किया। वे स्वयं बुजुर्ग महिला के घर गए और चूर्ण बनाया है।मां ने बड़े प्रेम से वह नीम का चूर्ण तैयार किया और राजा ने उसे भगवान जगन्नाथ को भोग के रूप में अर्पित किया। भगवान ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। उस दौरान से अब तक नीम का भोग चढ़ाने की परंपरा चलाई जा रही है। 56 भोग के बाद भगवान को नीम के चूर्ण का भोग भी लगाया जाता है।






