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World Day Against Child Labour 2026: बाल श्रम मुक्त भारत की ओर बढ़ते कदम मगर…. चुनौतियां अब भी बरकरार
- Written By: स्निग्धा श्रीवास्तव
Child Labour in India: हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस (World Day Against Child Labour) मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य बाल श्रम के खिलाफ वैश्विक स्तर पर जागरूकता फैलाना है।

बालश्रम निषेध दिवस (सोर्स- AI)
World Day Against Child Labour 2026: मासूमियत, सीखने की ललक और बेफिक्री से भरा बचपन… जीवन का सबसे स्वर्णिम काल होता है। बचपन ऐसा समय होता है जब मन में अनन्त जिज्ञासाएं होती हैं। किसी भी सभ्य समाज की पहचान वहां के बच्चों की शिक्षा और उनके सुरक्षित भविष्य से होता है। पर विडंबना है कि आज भी दुनिया के करोड़ों बच्चे ऐसे है जो अपना बचपन तक गंवा बैठे है।
कोई खेलने की उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठाए ईंट-भट्ठों की तपिश में झुलसता है तो कोई हाथों में हथौड़ा, फावड़ा या चाय की केतली लेकर दौड़ लगाता है। इसका कारण केवल आर्थिक अभाव ही नहीं बल्कि सामाजिक असमानता और प्रशासनिक उदासीनता है।
प्रत्येक वर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस (World Day Against Child Labour) मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य बाल श्रम के खिलाफ वैश्विक स्तर पर जागरूकता फैलाना, बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति सशक्त बनाना और उन्हें बाल श्रम से मुक्त कर शिक्षा प्रदान करना है।
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अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो आज भी रेस्टोरेंट, ढाबों, दुकानों और अन्य जगहों पर छोटे बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे। सभी जानते है कि चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना या करने को मजबूर करना, अपराध है। इसके लिए सजा भी हो सकती है लेकिन इसके बावजूद लोग थोड़े से लाभ के लिए बालश्रम पर विराम नही लग पा रहे हैं। बच्चों के हितों और संरक्षण का मामला भारत के संविधान में निहित है। इसके बावजूद, स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी बच्चों के अधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि बालश्रम है क्या..तो बता दें कि भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक कोई भी 14 वर्ष से कम आयु का बच्चा जो मजदूरी करता है बाल श्रमिक की श्रेणी में आता है। भारत का प्रत्येक हर दस में एक बच्चा बालश्रम के कारण स्कूल नहीं जा पाता है। हालांकि हर कार्य बालश्रम की श्रेणी में नही आता है परिवार के साथ सुरक्षित कार्यों में सहयोग, कौशल सीखना या घर के सामान्य कार्यों में मदद करना बाल श्रम की श्रेणी में नहीं है लेकिन जब किसी बच्चे को कमाने के नाम पर विद्यालय छोड़कर पूर्णकालिक श्रम में धकेल दिया जाता है, तब वह बाल श्रम कहलाता है।
अब तो बालश्रम में भी बदलाव कर दिया गया है पहले जहां बच्चे कारखानों, खदानों और खेतों में दिखाई देते थे, वहीं अब घरेलू उद्योगों, कचरा प्रबंधन, ई-कॉमर्स आपूर्ति शृंखलाओं और डिजिटल माध्यमों में भी कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। शोषण के तरीके बदले हैं, लेकिन समस्या वही है।
बाल श्रम की समस्या देश में आज भी चुनौती बन कर खड़ी है। वैसे सरकार निरंतर इस समस्या निजात पाने के लिए कई सकारात्मक पहल कर रही है लेकिन फिर भी समस्या अभी भी जटिल बनी हुई है। भारत में गरीबी और निरक्षरता ही बाल श्रम को जन्म देती है।
बालश्रम निषेध दिवस
बालश्रम निषेध दिवस की शुरुआत पहली बार 2002 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य बाल श्रम को ख़त्म करने के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करना और बच्चों को शोषण से बचाना है। आंकड़ों के अनुसार, विश्व भर में अभी भी करोड़ों बच्चे बाल श्रम के शिकार है। भारत सरकार ने बच्चों को बाल श्रम से बचाने के लिए बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम लागू किया है। इसके तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी खतरनाक उद्योग/काम में लगाना कानूनी अपराध है।
बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण है गरीबी
बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण है- गरीबी। जब कोई गरीब परिवार दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा हो तब शिक्षा जैसा निवेश नही बल्कि बच्चे की मजदूरी करके आय का रास्ता निकालेगा। हालांकि यह रास्ता भविष्य में और अधिक गरीबी को जन्म देता है। शिक्षा से वंचित बच्चा बड़ा होकर श्रमिक ही बनेगा और अगली पीढ़ी भी उसी गरीबी के चक्र में फंसती जाएगी।
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बाल श्रम का नया चेहरा- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स
तकनीक ने विकास के साथ- साथ बाल श्रम के रूप को भी बदल दिया है। आज सोशल मीडिया पर ऑनलाइन कंटेंट निर्माण के नाम पर बच्चों का व्यावसायिक उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों की लोकप्रियता को लोगों ने आर्थिक लाभ का माध्यम बना लिया है। घंटों कैमरे के सामने काम करना, ज्यादा लाइक और फॉलो बटोरने का प्रेशर बच्चे को मानसिक दबाव की ओर धकेल रहा है।
बाल श्रम के दुष्परिणाम
लंबे समय तक काम करने से बच्चे कुपोषण जैसी कई खतरनाक बीमारियों का शिकार होते है। बच्चों में तनाव, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी कई समस्याएं विकसित हो सकती हैं।
भारत का संविधान और कानून व्यवस्था
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
- अनुच्छेद 23 : बंधुआ मजदूरी और मानव तस्करी पर प्रतिबंध।
- अनुच्छेद 24 : 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में नियोजित करने पर रोक।
- अनुच्छेद 39 (ई) एवं (एफ) : बच्चों के स्वास्थ्य और विकास की रक्षा का निर्देश।
इसके अतिरिक्त बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 (संशोधित 2016), शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 तथा किशोर न्याय अधिनियम बच्चों के अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है।
बाल मजदूरी के आंकड़े
2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार
कुल बच्चों की आबादी– 25.2 करोड़
5-14 आयु के कामकाजी बच्चे- 1.26 करोड़
2004-05 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार- अनुमानित कामकाजी बच्चों की संख्या 90.75 लाख
2011 की जनगणना के मुताबिक- 5-14 वर्ष की आयु के कामकाजी बच्चों की संख्या 43.53 लाख (पहले से कम)
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र, यूनिसेफ और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में दुनिया भर में करीब 13.8 करोड़ बच्चे बाल श्रम के शिकार हुए। जिनमें से लगभग 5.4 करोड़ बच्चे खतरनाक कामों में लिप्त थे। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में बाल श्रम के मामलों में कमी आई है, अभी भी पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य काफी दूर है। रिपोर्ट की माने तो गरीबी, शिक्षा की कमी, बेरोजगारी और खराब आर्थिक स्थिति ही बालश्रमिक को जन्म देती है।
बाल श्रम को रोकने के उपाय
- बाल श्रम को रोकने में समाज के हर व्यक्ति को अपनी भागीदारी का संकल्प लेना होगा।
- यदि आप बाल श्रम के उन्मूलन में योगदान देना चाहते हैं तो अपने आस-पास के लोगों को बाल श्रम के दुष्प्रभावों से अवगत कराए, शिक्षा को बढ़ावा दें, गरीब और वंचित बच्चों की शिक्षा प्राप्त करने में मदद करें।
- क्योंकि शिक्षा ही बाल श्रम का सबसे सही और प्रभावी समाधान है।
- यदि आपको अपने आस-पास कोई बच्चा काम करते हुए दिखाई दें तो आप पेंसिल पोर्टल (PENCIL Portal) पर जाकर सीधे शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह बाल श्रम के खिलाफ भारत सरकार की एक आधिकारिक वेबसाइट है।
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