एक चुनावी हार और बिखर गई TMC… बागी विधायकों ने ममता को अब तक क्यों नहीं किया पार्टी से बाहर? जानें कारण
TMC Political Crisis: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस में बड़ी बगावत हो गई है, जहाँ ऋतब्रत बनर्जी 59 विधायकों के साथ खुद को असली टीएमसी बता रहे हैं।
- Written By: अक्षय साहू
ममता बनर्जी, ऋतब्रत बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
TMC Split Reason: पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐतिहासिक और निर्णायक दौर से गुजर रही है। हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा 80 में 59 विधायकों को लेकर स्पीकर के सामने खुद असली टीएमसी होने का दावा ठोक दिया।
तृणमूल कांग्रेस की कलह ने ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। कल तक वो बीजेपी को घेरने और प्रदर्शन करने की बात कर रही थी, लेकिन अब वो अपनी ही बनाई पार्टी में अपनी जगह बचाने की लड़ाई लड़ रही है। ऐसे में सवाल आता है कि ममता बनर्जी से कहां चूक हो गई? ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा 59 विधायकों के साथ बीजेपी में क्यों शामिल नहीं हुए?
चुनाव परिणाम आते ही बिखरने लगी थी TMC
4 मई 2026 को विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आए थे। परिमाणों ने राज्य के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए। भाजपा प्रचंड जीत के साथ 207 सीटें हासिल करने में कामयाब रही। जबकि टीएमसी को लगभग 41 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद केवल 80 सीटों से संतोष करना पड़ा। यह हार केवल चुनावी पराजय नहीं थी, बल्कि उसने पार्टी के अंदर सालों से पनप रहे असंतोष को भी खुलकर सामने ला दिया।
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टीएमसी के बागी विधायक (सोर्स- सोशल मीडिया)
चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद, 6 मई को ममता बनर्जी ने पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई। बैठक के दौरान उन्होंने अपने भतीजे और पार्टी के प्रमुख नेता अभिषेक बनर्जी की चुनावी भूमिका की तारीफ की। हालांकि, कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके इस कदम की खुलकर आलोचना की। ऋतब्रत बनर्जी, संदीपान साहा और कुणाल घोष जैसे नेताओं ने चुनावी हार के लिए अभिषेक बनर्जी तथा चुनावी रणनीति तैयार करने वाली संस्था आई-पैक (I-PAC) को जिम्मेदार ठहराया। इस घटना के बाद से ही अंदेशे लगाएं जाने शुरू हो गए थे कि टीएमसी में अंदर किसी भी वक्त बगावत हो सकती है।
बागी नेताओं को बाहर करना बड़ी भूल
ममता बनर्जी ने इसके बाद 1 जून को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में टीएमसी से निष्कासित कर दिया। ममता का ये फैसला उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। क्योंकि इसके तुरंत बाद ऋतब्रत ने बड़ा राजनीतिक दांव खेला। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को 59 बागी विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए एक पत्र सौंपा और खुद को “असली टीएमसी” का नेता घोषित किया।
ऋतब्रत बनर्जी बने विपक्ष के नेता
विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को मान्यता देते हुए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) का दर्जा प्रदान कर दिया और उन्हें विधानसभा में नेता विपक्ष के कार्यालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी। इस फैसले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
चुनाव परिणाम के बाद अकेली पड़ी ममता बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
दिलचस्प बात यह रही कि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने स्पीकर को जो पत्र सौंपा उसमें ममता बनर्जी को पार्टी का नेता स्वीकार बताया गया। पत्र में ऋतब्रत को विधानसभा में विपक्ष का नेता घोषित करने की मांग की गई थी। ऋतब्रत बनर्जी चाहते तो खुद को अलसी टीएमसी बताते हुए ममता से पार्टी की कमान आसानी से छीन सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इससे लेकर कई सवाल उठे।
ऋतब्रत ने ममता को TMC से बाहर क्यों नहीं किया?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, भले ममता इस समय कमजोर नजर आ रही है, लेकिन पार्टी में उन्हें लेकर कोई समस्या नहीं है। क्योंकि किसी भी बागी विधायक ने विधानसभा चुनाव में मिली हार के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया है। सभी के निशाने पर केवल अभिषेक बनर्जी पर ही रहे हैं। इसके अलावा कई बागी अब भी ममता बनर्जी को अपना नेता बता रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने यह कदम केवल पार्टी को बचाने के लिए उठाया है। ऐसे में माना जा रहा है पार्टी में अभिषेक के मुकाबले ममता को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर अभी भी बरकरार है।
ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
इसके अलावा ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर निर्विवाद रूप से टीएमसी का सबसे बड़ा चेहरा है। ऐसे में ऋतब्रत और बाकी नेता नहीं चाहेंगे कि ममता अपनी कोई दूसरी पार्टी बनाए। इसके अलावा बंगाल की मुस्लिम आबादी अभी ममता को अपने नेता के तौर पर देखती है। चुनाव में भी उनकी पार्टी को मुस्लिम बहुल इलाकों भरपूर समर्थन मिला था।
क्या टीएमसी को तोड़ेगी बीजेपी?
भाजपा सांसद सौमित्र खान का दावा है कि टीएमसी के लगभग 50 विधायक और 20 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा फिलहाल बागी नेताओं को अपने दल में शामिल करने की जल्दबाजी में नहीं है।
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विशेषज्ञों के अनुसार भाजपा की रणनीति यह है कि टीएमसी एकजुट विपक्ष के रूप में मजबूत न बन सके। अगर पार्टी लगातार आंतरिक संघर्षों में उलझी रहती है, तो भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का सामना कम करना पड़ेगा। साथ ही भाजपा यह भी नहीं चाहती कि टीएमसी की कमजोरी का लाभ उठाकर कांग्रेस या वामपंथी दल दोबारा मजबूत स्थिति में लौट आएं। इसलिए भाजपा स्थिति पर नजर बनाए रखते हुए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।
