
कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
UGC New Regulations: यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू किए। इन नियमों के लागू होते ही सियासत गरमा गई है। इसका सीधा असर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के ऊपर देखने को मिल रहा है। जबकि विपक्षी दल चुप्पी साधे हुए हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं? कौन से बड़े चेहरे बगावत पर उतर आए हैं? चलिए जानते हैं….
13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू होते ही बवाल मच गया। क्षत्रिय-ब्राह्मण समाज और अन्य सवर्ण संगठन मुखर होकर आगे आ गए। चाय की चौपालों से लेकर सोशल मीडिया के इदारों तक विरोध के सुर उठने लगे। देखते ही देखते विरोधी सुर इस्तीफों में तब्दील होने लगे।
सबसे पहले बलरामपुर में भाजपा नेता और पूर्व विस्तारक मृगेंद्र उपाध्याय ने यूजीसी के नए नियमों का विरोध करते हुए बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया। इसके बाद गणतंत्र दिवस के दिन बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया। शाम होते-होते लखनऊ में कुम्हरावां मंडल के आधा दर्जन से ज्यादा सवर्ण पदाधिकारियों ने भाजपा को टाटा बाय-बाय कह दिया।
अगली सुबह यानी आज 27 जनवरी को विरोध और गहराया, पार्टी के अंदर बगावती सुर और तेज हो गए। यूपी के बाहुबली नेता बृज भूषण शरण सिंह के बेटे और बीजेपी विधायक प्रतीक भूषण ने बड़ा बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि इतिहास के दोहरे मापदंडों की अब गहन विवेचना होनी चाहिए, जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को ‘अतीत की बात’ कहकर भुलाया जाता रहा है; जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है।
कानपुर के बिठूर से कद्दावर बीजेपी नेता बीजेपी और विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने भी नए यूजीसी नियमों पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस कानून की समीक्षा करनी चाहिए और सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि समाज को न्याय मिल सके। इसके अलावा, बीजेपी एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को एक पत्र लिखकर कहा कि प्रस्तावित प्रावधान सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा सकते हैं और उच्च शिक्षा प्रणाली में जातिगत तनाव बढ़ा सकते हैं। इससे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था बाधित हो सकती है और समाज में जातिगत संघर्ष भड़क सकते हैं।
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह ने भी नए यूजीसी नियमों का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति शिक्षण संस्थानों में चिंता और डर का माहौल बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि संतुलित प्रतिनिधित्व के बिना बनी समितियां न्याय नहीं दे सकतीं। ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक फैसले लेती हैं, जिनसे समस्याओं का समाधान नहीं होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय के रास्ते पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की असमानता को रोकने के लिए फैसले लेने की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है।
झारखंड के गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि मोदी है तो मुमकिन है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यूजीसी के नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियों को दूर किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस आरक्षण का जिक्र करते हुए कहा कि मंडल कमीशन के बाद न जाने कितनी पार्टियों ने सरकार बनाई लेकिन न्याय केवल मोदीकाल में हुआ। प्रतीक्षा कीजिए यूजीसी की भ्रांतियां भी खत्म होंगी।
यूजीसी के नए नियम (इन्फोग्राफिक- AI)
इसी मुद्दे पर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सवर्ण समाज नाराज ही नहीं है और न ही किसी के साथ अन्याय हो रहा है। उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए नियमों उद्देश्य किसी वर्ग को पीछे करना नहीं, बल्कि उन तबकों को आगे बढ़ाना है जो एतिहासिक रूप से विकास की दौड़ में पीछे हो गए हैं।
यूजीसी के नए नियमों को लेकर हो रहे विरोध के बीच डैमेज कंट्रोल की कोशिश भले ही की जा रही हो, लेकिन इस मुद्दे पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से जब-तक कोई बयान नहीं आता या फिर इन नियमों को सही से स्पष्ट नहीं किया जाता या इनमें बदलाव नहीं किया जाता तब तक शायद ही यह विरोध शांत हो। और विरोध शांत नहीं हुआ तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता है।
एक तरफ यूजीसी के नियमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के अंदर ही बगावत की ज्वाला धधक उठी है, तो दूसरी तरफ तकरीबन हर मुद्दे पर मोदी सरकार का मुखर विरोध करने वाला विपक्ष चुप्पी साधे हुए हुए। इस चुप्पी के पीछे की असली वजह दलित और ओबीसी हैं, जो यूजीसी के नियमों को समाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने तो PDA (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) का खुला नारा दे रखा है। जबकि कांग्रेस भी इन्हीं तबकों में अपनी पैठ बनाने में जुटी हुई है।
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चुप्पी का दूसरा कारण यह भी है कि यूजीसी के नए नियमों का विरोध करने वाले सभी अगड़ी जाति के लोग हैं, जिन्हें बीजेपी के कोर वोटर के तौर पर जाना जाता है। इसलिए विपक्ष इस मुद्दे पर खुद को वेट एंड वॉच की स्थिति में बनाए हुए है। उसे यह पता है कि सवर्ण वोट बीजेपी से छिटका तो सपा और कांग्रेस जैसे मजबूत दलों के साथ ही आएगा। यही वजह है कि वह यूजीसी नियमों का विरोध न करते हुए दलित और ओबीसी समाज के वोटर्स को बिना नाराज किए इस मौके का फायदा उठाना चाहता है।
यूजीसी के नियमों के मुताबिक, इन समानता समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं का होना अनिवार्य किया गया है। नोटिस के अनुसार, हर संस्थान को एक समान अवसर केंद्र (EOC) खोलना होगा। यह केंद्र वंचित वर्गों के लिए बनी योजनाओं को लागू करने पर कड़ी नजर रखेगा। साथ ही यह छात्रों को पढ़ाई, पैसे और समाज से जुड़े मामलों में जरूरी सलाह भी देगा।
EOC सबसे मुख्य काम कैंपस में विविधता और समानता को बढ़ावा देना होगा। नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर किसी कॉलेज में समिति के लिए कम से कम पांच सदस्य नहीं हैं, तो उस कॉलेज का काम उससे जुड़ी यूनिवर्सिटी का केंद्र संभालेगा।
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अधिसूचना के अनुसार, यह केंद्र नागरिक समाज, स्थानीय मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, गैर-सरकारी संगठनों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और अभिभावकों के साथ समन्वय कर नियमों के उद्देश्यों को पूरा करेगा। इसके अलावा, जरूरतमंद मामलों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों से भी समन्वय किया जाएगा।
नियमों के तहत EOC का काम संबंधित समुदाय को समता एवं समानता के अवसर उपलब्ध कराना, सामाजिक समावेश लाना और छात्र, शिक्षण व गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच समता को बढ़ाना है। इसका उद्देश्य भेदभाव की धारणा खत्म करना और वंचित वर्ग से जुड़े छात्र समूहों की सहायता करना है।
Ans: UGC के नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में समानता समिति और Equal Opportunity Centre (EOC) बनाना अनिवार्य किया गया है। इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व जरूरी होगा। EOC का काम वंचित वर्गों के लिए बनी योजनाओं की निगरानी करना, छात्रों को शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक मामलों में मार्गदर्शन देना और कैंपस में समानता व समावेशन को बढ़ावा देना है।
Ans: बीजेपी के कुछ नेताओं और सवर्ण संगठनों का मानना है कि नए नियमों से उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत संतुलन बिगड़ सकता है और सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। इसी आशंका के चलते पार्टी के भीतर इस्तीफे, बयानबाज़ी और असंतोष सामने आया है। कई नेताओं ने नियमों की समीक्षा और सभी वर्गों के हितों की सुरक्षा की मांग की है।
Ans: विपक्षी दलों की चुप्पी की बड़ी वजह यह है कि दलित और ओबीसी वर्ग इन नियमों को सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं। चूंकि UGC नियमों का विरोध मुख्य रूप से सवर्ण तबकों से आ रहा है, जो बीजेपी का कोर वोट बैंक माने जाते हैं, इसलिए विपक्ष ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति अपनाए हुए है ताकि वह न तो पिछड़े वर्गों को नाराज़ करे और न ही संभावित सवर्ण वोटों के खिसकने से नुकसान उठाए।






