होर्मुज की दोहरी नाकेबंदी से बढ़ी टेंशन, फूलने लगी जापान से लेकर सिंगापुर की सांसें, भारत पर कितना पड़ेगा असर?
Hormuz Blockade Update: शांति वार्ता विफल होने के बाद ट्रंप ने होर्मुज की नाकेबंदी कर दी है। दुनिया के 20% तेल व्यापार पर संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल की कीमतों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
- Written By: अक्षय साहू
होर्मुज की नाकाबंदी से भारत में LPG-तेल आपूर्ति का संकट (सोर्स- सोशल मीडिया)
Strait of Hormuz Blockade Impact on India: इस्लामाबाद शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी का आदेश देकर पूरी दुनिया में एक बार फिर हलचल तेज कर दी है। इस आदेश के तहत इस मार्ग से गुजरने वाले सभी जहाजों को रोकने की बात कही गई है। यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि पहले ट्रंप ईरान द्वारा होर्मुज को अवरुद्ध करने का विरोध करते रहे हैं, जबकि अब वे खुद उसी तरह का कदम उठा रहे हैं।
ट्रंप के निर्देश के बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों से जुड़े सभी समुद्री यातायात पर नजर रखेगी और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करेगी। इसमें फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बंदरगाह भी शामिल हैं। सेंटकॉम ने स्पष्ट किया है कि इस नाकाबंदी का असर सभी देशों पर पड़ेगा, और रिपोर्ट्स के अनुसार इसकी शुरुआत भी हो चुकी है।
एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर
जापानी निवेश बैंक नोमुरा की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस बढ़ते तनाव का सबसे अधिक प्रभाव एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। चीन को छोड़कर जापान, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देश विशेष रूप से जोखिम में हैं, क्योंकि वे अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करते हैं।
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होर्मुज संकट का भारत पर असर
होर्मुज संकट को लेकर भारत की स्थिति भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, क्योंकि देश अपनी लगभग 60% एलएनजी आपूर्ति इसी क्षेत्र से प्राप्त करता है। हालांकि ईरान ने भारत को भरोसा दिलाया है कि तेल की सप्लाई बाधित नहीं होगी, लेकिन क्या अमेरिका जिसने होर्मुज की नाकेबंदी ही ईरान को आर्थिक रूप कमजोर करने की लिए की है। वो भारत को ईरान से तेल खरीदने देगा इसके लेकर सस्पेंस बरकरार है।
यदि होर्मुज मार्ग में रुकावट जारी रहती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ेगा। दुनिया के लगभग 20% तेल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है, जबकि भारत के लिए यह आंकड़ा और भी अधिक है। ऐसे में किसी भी तरह की नाकाबंदी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
अपनी जरूरतों के लिए होर्मुज पर निर्भर भारत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है, अपनी जरूरत का करीब 85% तेल आयात करता है। खाड़ी देशों से आने वाला अधिकांश तेल होर्मुज के रास्ते ही पहुंचता है। पहले ईरान द्वारा की गई नाकाबंदी के दौरान भारत को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, हालांकि पुराने संबंधों के चलते भारतीय जहाजों को कुछ राहत मिली थी।
अमेरिका की इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना माना जा रहा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिकी नौसेना चीनी तेल टैंकरों को भी रोकेगी, क्योंकि चीन ईरान से तेल आयात करने वाला सबसे बड़ा देश है।
कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा असर
लंबे समय तक होर्मुज में नाकेबंदी रहने से तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे महंगाई और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव उर्वरक, रसायन और उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता पर भी दिख सकता है। फिलहाल, एक सकारात्मक पहलू यह है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल आयात बढ़ा रहा है, जिससे कुछ हद तक जोखिम कम हो सकता है।
यह भी पढ़ें- Iran US तनाव में चीन की सीधी एंट्री: होर्मुज नाकेबंदी पर अमेरिका को दी कड़ी चेतावनी
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार की रुकावट का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।
Frequently Asked Questions
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Que: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी क्यों महत्वपूर्ण है?
Ans: यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% वहन करता है। नाकेबंदी से तेल सप्लाई बाधित होगी, कीमतें बढ़ेंगी और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ेगा।
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Que: भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
Ans: भारत अपनी 85% तेल जरूरत आयात करता है और बड़ी मात्रा होर्मुज से आती है। नाकेबंदी से ऊर्जा संकट, महंगाई और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है।
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Que: एशियाई देशों के लिए यह स्थिति कितनी गंभीर है?
Ans: जापान, थाईलैंड, फिलीपींस जैसे देश मिडिल ईस्ट तेल पर निर्भर हैं। नाकेबंदी से उनकी अर्थव्यवस्था पर दबाव, ऊर्जा लागत में वृद्धि और विकास दर प्रभावित हो सकती है।
