मोहन भागवत का बड़ा बयान, बोले- दुनिया शरीर है तो भारत उसकी आत्मा, बताया क्यों नहीं मिटती हमारी हस्ती

Mohan Bhagwat Speech: RSS चीफ मोहन भागवत ने नागपुर में संतों को संबोधित करते हुए भारत की आध्यात्मिक शक्ति का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भौतिकवाद के दौर में भारत का ज्ञान ही दुनिया को रास्ता दिखाएगा।
RSS Chief Mohan Bhagwat Speech Nagpur
RSS चीफ मोहन भागवत (सोर्स: सोशल मीडिया)
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RSS Chief Mohan Bhagwat Speech Nagpur: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत की प्राचीन संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। नागपुर में आयोजित 'पंचकल्याणक प्रतिष्ठा गजरथ महोत्सव' के दौरान संतों की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने भारत को विश्व की आत्मा करार दिया।

मोहन भागवत ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया की कई महान सभ्यताएं समय के साथ इतिहास के पन्नों में दफन हो गईं, लेकिन भारत आज भी अपने पूरे गौरव के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा, "यह अक्सर कहा जाता है कि यूनान, मिस्र और रोम की प्राचीन सभ्यताएं दुनिया से मिट गईं, लेकिन हमारे अस्तित्व में कुछ तो विशेष बात है कि यह कभी नहीं मिटा। यह विशेष बात वह आध्यात्मिक ज्ञान है, जो हमें हमारे संतों और महात्माओं के माध्यम से विरासत में मिला है।"

भौतिकवाद के तूफानों के बीच ढाल है आध्यात्म

दुनिया के वर्तमान हालातों पर चिंता व्यक्त करते हुए भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया भौतिकवाद और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में शामिल है। इन तूफानों ने कई विकसित समाजों की नींव हिला दी और उन्हें नष्ट कर दिया। लेकिन भारत के पास अपने पूर्वजों का दिया हुआ वह ज्ञान और बुद्धिमत्ता है, जिसने हमें इन चुनौतियों के बीच भी टिकाए रखा है।

विश्व का मार्गदर्शक बनेगा भारत

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि जब तक भारत का अस्तित्व सुरक्षित है, तब तक दुनिया भी सुरक्षित रहेगी। उन्होंने एक रूपक का उपयोग करते हुए कहा कि यदि दुनिया एक शरीर है, तो भारत उसकी आत्मा है। उनका मानना है कि जब-जब विश्व किसी बड़े संकट में फंसता है या वैचारिक रूप से भटकता है, तब भारत ही वह देश है जो उसे शांति और मानवता का सही रास्ता दिखाता है।

अंत में, RSS प्रमुख मोहन भागवत संतों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाना और देश की इस समृद्ध परंपरा को जीवित रखना संतों का ही पुरुषार्थ है। उनके अनुसार, दुनिया के पास वह गहरा आध्यात्मिक बोध नहीं है जो भारत के पास सदियों से संचित है।

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