हैफा दिवस (सौ.सोशल मीडिया)
आज का दिन जितना भारतवासियों के लिए खास है उतना ही इजरायल देश के लिए महत्वपूर्ण है। आज 23 सितंबर के दिन कुछ दशक पहले भारतीय सैनिकों ने इजरायल के हाइफा शहर में संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त किया था। यहां पर आज भी भारतीय सैनिकों की वीरगाथा को याद किया जाता है। इस देश के बच्चे भारतीय सैनिकों की शौर्य गाथा पढ़ते है।
चलिए जानते हैं आखिर कैसे हाइफा का नाता भारत से जुड़ गया, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई इस लड़ाई को आज भी सबसे बहादुरी से लड़ा गया युद्ध माना जाता है।
आपको बताते चलें कि, 23 सितंबर 1918 को 15वीं कैवेलरी ब्रिगेड जिसमें घुड़सवार भी शामिल थे, जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर रियासत से रवाना हुए। इन भारतीय सैनिकों के पास सिर्फ तलवार और भाले थे इनका प्रयोग करके सैनिकों ने हमला किया और इस शहर हैफा को ओट्टोमन सेना के चंगुल से आजाद करके देश के दिलों में अपनी जगह बना ली। इस संघर्ष में साहस का परिचय देने वाले नेतृत्व जनरल एडमुंड एलेनबाइ है जिन्होनें शहर की आजादी में अहम भूमिका अदा की. भारतीय रेजीमेंट्स ने कुल 1,350 जर्मन और ओट्टोमन सैनिकों को कैद किया था। इन सभी को भारतीय सैनिकों ने भगाया था।
इन भारतीय सैनिकों में शामिल कैप्टन अमन सिंह बहादुर और दफादार जोर सिंह को सम्मान मिला। कैप्टन अनूप सिंह और सेकेंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया,मेजर दलपत सिंह को तो ‘हीरो ऑफ हाइफा’ भी कहा जाता है। उन्होंने हाइफा को आजादी दिलानें में एक बड़ा रोल अदा किया था।
यहां पर हाइफा की लड़ाई शहर के लिए बेहद खास थी इसलिए हाइफा के म्यूनिसिपल बोर्ड ने फैसला लिया कि वह भारतीय सैनिकों की शहादत को सम्मानित करेगा। इसके साथ ही एक और प्रयास किया गया है कि, हां के स्कूलों में भी हाइफा की लड़ाई को पाठ्यक्रम के तौर पर शामिल कर बच्चों को वीर भारतीय सैनिकों के बलिदान के बारे में पढ़ाया जाता है।हर वर्ष म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की ओर से एक कार्यक्रम आयोजित होता है। बताया जाता है कि, करीब 400 साल तक हाइफा, टर्की के चंगुल में रहा था।