SC का बड़ा फैसला- बाल विवाह वाले कानून पर असर नहीं डाल सकता पर्सनल लॉ, जारी की गाइडलाइन
बाल विवाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। आज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम को ‘पर्सनल लॉ' प्रभावित नहीं कर सकते और बचपन में कराए गए विवाह अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का विकल्प छीन लेते हैं।
- Written By: राहुल गोस्वामी
बाल विवाह पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
नई दिल्ली : आज बाल विवाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। आज मामले पर CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि, बाल विवाह रोकने के लिए हमें अवेयरनेस की जरूरत है, सिर्फ सजा के प्रावधान कर देने से कुछ नहीं होगा।
आज इस मामले पर CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि, हमने बाल विवाह की रोकथाम पर बने कानून (PCMA) के उद्देश्य को देखा और इसे भली भांती समझाा। इसके अंदर बिना किसी नुकसान के सजा देने का प्रावधान है, जो अप्रभावी ही साबित हुआ है। हमें इसके लिए वृहद अवेयरनेस कैंपेनिंग की जरूरत है ।
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इसके साथ ही आज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम को ‘पर्सनल लॉ’ प्रभावित नहीं कर सकते और बचपन में कराए गए विवाह अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का विकल्प छीन लेते हैं। इस बाबात CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने देश में बाल विवाह रोकथाम कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई दिशानिर्देश भी जारी किए।
CJI चंद्रचूड़ ने आज फैसला पढ़ते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के कानून को ‘पर्सनल लॉ’ के जरिए प्रभावित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस तरह की शादियां नाबालिगों की जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन हैं।
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बेंच ने कहा कि अधिकारियों को बाल विवाह की रोकथाम और नाबालिगों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उल्लंघनकर्ताओं को अंतिम उपाय के रूप में दंडित करना चाहिए। बेंच ने यह भी कहा कि बाल विवाह निषेध कानून में कुछ खामियां हैं। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 बाल विवाह को रोकने और इसका उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था। इस अधिनियम ने 1929 के बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम का स्थान लिया।
आज बेंच ने कहा, ‘‘निवारक रणनीति अलग-अलग समुदायों के हिसाब से बनाई जानी चाहिए। यह कानून तभी सफल होगा जब बहु-क्षेत्रीय समन्वय होगा। कानून प्रवर्तन अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। हम इस बात पर जोर देते हैं कि इस मामले में समुदाय आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।”
जानकारी हो कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 10 जुलाई को हुई सुनवाई के बाद इस बाबत अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस याचिका सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलेंटरी एक्शन द्वारा साल 2017 में लगाई थी। इस बाबत NGO का आरोप था कि बाल विवाह निषेध अधिनियम को इससे घटीत मामलों पर शब्दशः लागू नहीं किया जा रहा है। (एजेंसी इनपुट के साथ)
