सुप्रीम कोर्ट (डिजाइन फोटो)
Supreme Court on NCERT: एनसीईआरटी ने संबंधित पुस्तक के ई-वर्जन को अपनी वेबसाइट से उतार लिया है और जो 32 हार्ड कॉपी बिक गई थीं, उन्हें भी वापस लेने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि 2,24,968 किताबों को विक्रेताओं के पास से वापस वेयरहाउस में मंगा लिया गया है। विवादित पुस्तक की 2.25 लाख प्रतियां छापी गईं थीं। यह सब काम सुप्रीम कोर्ट के गुस्से के बाद हुआ है।
विवाद के केंद्र में कक्षा 8 के लिए तैयार की गई सोशल साइंस की नई पाठ्यपुस्तक (भाग 2) है, जिसे एनसीईआरटी ने प्रकाशित किया है और इसका संपादन मिशेल डानिनो व अलोक प्रसन्ना ने किया है। इस किताब के पाठ 4, जिसका शीर्षक है ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’, इसमें न्यायपालिका के समक्ष चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। चुनौतियों में भ्रष्टाचार, बहुत बड़ी संख्या में लम्बित मुकदमें और न्यायाधीशों की कमी को विशेषरूप से शामिल किया गया है।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार सुनते ही सुप्रीम कोर्ट आगबबूला हो गया और तुरंत हरकत में आ गया। सरकार ने भी इसे बहुत बड़ी भूल/चूक माना और धर्मेंद्र प्रधान ने बिना शर्त माफी मांगी। लेकिन माफी के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी 2026 को सोशल साइंस की इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और हर रूप में इसके प्रसार पर रोक लगाते हुए स्कूल शिक्षा सचिव व एनसीईआरटी के प्रमुख को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि उनके खिलाफ अवमानना की प्रक्रिया क्यों न आरंभ की जाये? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ‘माफी के अयोग्य गलती’ के लिए क्षमा मांगते हुए कहा कि जिन दो व्यक्तियों ने संबंधित पुस्तक का सम्पादन किया है, उन पर सरकार ने स्थायी रूप से रोक लगा दी है कि उन्हें किसी भी पाठ्यपुस्तक तैयार करने में शामिल नहीं किया जायेगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची व न्यायाधीश विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने सरकार की माफी को फिलहाल स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और कहा है कि पहले वह यह जांच करेगी कि न्यायिक संस्था की प्रतिष्ठा व गरिमा को नुकसान पहुंचाने की कहीं जानबूझकर व सुनियोजित योजना तो नहीं थी? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘बिना सोचे समझे एक तीर चलाया गया है और न्यायपालिका जख्मी हुई है। योजना न्यायपालिका को बदनाम करने की थी, छात्रों, उनके पैरेंट्स व अध्यापकों और पूरे समाज को यह बताकर कि न्यायपालिका भ्रष्ट है। इस संस्था का मुखिया होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं न्यायपालिका की रक्षा इस किस्म के भयंकर व आधारहीन आक्षेपों से करूं।’
खंडपीठ ने आदेश दिया, ‘एनसीईआरटी केंद्र व राज्य शिक्षा विभागों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करे कि पुस्तक की सभी प्रतियां (हार्ड या सॉफ्ट) जो वर्तमान में प्रसार में हैं, चाहे स्टोरेज में हों, फुटकर दुकानों में हों या शैक्षिक संस्थानों में हों, उन्हें जब्त किया जाये और पब्लिक एक्सेस से हटाया जाये। अनुपालन को फाइल किया जाये।’ ‘एनसीईआरटी निदेशक और हर स्कूल के प्रधानाचार्य, जहां यह कितावा पहुंची है की व्यक्तिगत जिम्मेदारी होगी कि तुरंत प्रभाव से पुस्तक को जब्त किया जाये और उनके प्रांगण में पुस्तक की जो प्रतियां हैं, उन्हें सील किया जाये। सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों को अनुपालन करना है।’
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एनसीईआरटी से कहा गया है कि वह दो सप्ताह के भीतर अपनी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करे। अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है कि इस पुस्तक का आगे कभी भी प्रकाशन, पुनः मुद्रण या डिजिटला प्रसार न हो। इस आदेश से अगर चतुराई से बचने का कोई प्रयास किया जायेगा, इलेक्ट्रॉनिक तरीकों या शीर्षक बदलकर, तो उसे सीधा हस्तक्षेप, जानबूझकर उल्लंघन और निर्देशों का खुला विरोध माना जायेगा।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘कक्षा 8 के बच्चों को हम यह क्या पढ़ा रहे हैं, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में?’ ऐसा सूत्रों का कहना है। इसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि जो लोग एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का संदर्भ शामिल करने के लिए जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जायेगी।
लेख- नौशाबा परवीन के द्वारा