1200 फॉर्म और 30 से ज्यादा मौतें: सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर सुनाया बड़ा फैसला, राज्यों को दी नसीहत
Supreme Court ने चुनाव आयोग के SIR अभियान में लगे कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर BLO पर काम का बोझ ज्यादा है, तो उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं।
- Written By: सौरभ शर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने SIR ड्यूटी पर सुनाया बड़ा फैसला (कॉन्सेप्ट फोटो)
Supreme Court Remark on SIR: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान यानी कि SIR में लगे कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर बीएलओ पर काम का बोझ ज्यादा है, तो उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। राज्यों को अब सख्त निर्देश मिले हैं कि वे तुरंत अतिरिक्त स्टाफ की भर्ती करें ताकि मौजूदा कर्मचारियों पर दबाव कम हो सके। यह सुनवाई तब और गंभीर हो गई जब कोर्ट के सामने यह बात आई कि काम के दबाव में कई कर्मचारियों की जान जा चुकी है और कई आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं।
साउथ एक्टर विजय की पार्टी टीवीके ने एक याचिका दायर कर यह मुद्दा उठाया था। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट में यह बताया गया कि यूपी में बीएलओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज हैं और 7 राज्यों में 29 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं, तो बेंच ने इसे गंभीरता से लिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि सरकारी कर्मचारी चुनाव ड्यूटी और वैधानिक काम करने के लिए बाध्य हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन पर अमानवीय दबाव डाला जाए। अगर कोई बीमार है या उसके पास छूट मांगने का ठोस कारण है, तो राज्य सरकार को उसकी जगह किसी और को तैनात करना होगा।
क्या 10 फॉर्म भरना मुश्किल है?
सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प बहस छिड़ गई जब चुनाव आयोग की तरफ से तर्क दिया गया कि एक बीएलओ को महीने में 1200 फॉर्म भरने हैं, जो ज्यादा नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि क्या दिन के 10 फॉर्म भरना वाकई बोझ है? तब वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बीएलओ की जमीनी हकीकत बताई। उन्होंने कहा कि यह गणित में कम लग सकता है लेकिन हकीकत में यह 40 फॉर्म के बराबर मेहनत है। उन्होंने दलील दी कि बिना लिफ्ट वाली ऊंची इमारतों में सीढ़ियां चढ़कर हर घर जाना और डेटा जुटाना एक भारी मेहनत का काम है। कोर्ट ने इस तर्क को समझा और कहा कि अगर बीएलओ को दिक्कत हो रही है तो राज्यों का दायित्व है कि वे मदद के लिए अतिरिक्त कर्मचारी उपलब्ध कराएं।
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समय सीमा और फेक वोटरों का सच
कोर्ट ने मामले को सुलझाने के लिए तीन अहम निर्देश जारी किए हैं। पहला यह कि काम के घंटे कम करने के लिए ज्यादा स्टाफ रखा जाए। दूसरा, अगर किसी के पास वाजिब कारण है, तो उसकी अपील सुनी जाए। तीसरा, अगर फिर भी समाधान न मिले तो पीड़ित कर्मचारी कोर्ट आ सकता है। इससे पहले चुनाव आयोग ने एसआईआर की समय सीमा भी बढ़ाई थी। वहीं, बिहार के आंकड़ों पर चर्चा करते हुए चीफ जस्टिस ने राहत जताई कि वहां पुनरीक्षण में कोई भी घुसपैठिया या फर्जी वोटर नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि एसआईआर ने विदेशियों और फेक वोटरों को लेकर हमारी आशंकाओं को दूर कर दिया है। अब यह प्रक्रिया 14 फरवरी 2026 तक पूरी की जाएगी।
