

Supreme Court Verdict on Bihar SIR Case: सुप्रीम कोर्ट ने आज बिहार में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि, मतदाता सूची में नाम जोड़ना या घटना को लेकर चुनाव आयोग मिली शक्तियां संवैधानिक रूप से सही हैं। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने मामले दाखिल सभी याचिकों को खाजिर करते हुए चुनाव आयोग की शक्तियों को बरकरार रखा है।
जस्टिस सूर्यकांत ने फैसला सुनाते कहा कि, बिहार में चल रही विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया संविधान से उस मूल दायित्व से अलग नहीं है, जिसका संबंध स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने से है। कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में शुद्धता जांचने के लिए इस प्रकार की प्रक्रिया चलाने का पूर्ण अधिकार है।
जस्टिस सूर्यकांत ने मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि कोर्ट ने SIR अधिसूचना से जुड़े विवाद के प्रमुख मुद्दों को समझने के लिए तीन अहम सवाल तय किए थे और उन्ही के आधार पर मामले का परीक्षण किया गया। तीन प्रमुख सवाल इस प्रकार थे।
पहला प्रश्न: क्या चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है?
दूसरा प्रश्न: क्या यह प्रक्रिया किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है?
तीसरा प्रश्न: क्या इसके तहत अपनाए गए उपाय संतुलित एवं कानून के अनुकूल हैं?
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) चुनाव आयोग को मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण की शंक्तियां देते हैं। कोर्ट ने कहा कि, बिहार में बड़े पैमाने पर जनसंख्या में बदलाव, शहरीकरण और प्रवासन की वजह से मतदाता सूची में व्यापक बदलाव हुए हैं। जिसके चलते चुनाव आयोग ने बिहार में SIR की प्रक्रिया की।
बेंच ने आगे कहा कि, चुनाव आयोग का चुनावी प्रक्रिया की अखंडता को बराकरार रखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाना है। आयोग ने अपने इसी संवैधानिक दायित्व को निभाते हुए बिहार में SIR प्रक्रिया शुरु करने का फैसला किया। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी माना कि, SIR अभियान चलाया जाना चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए उठाया गया कदम है और यह किसी भी प्रकार से संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध नहीं जाता है। अदालत के अनुसार मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की पहली बुनियादी शर्त है और चुनाव आयोग को इस दिशा में फैसले लेने का पूर्ण अधिकार है।