CJI सूर्यकांत की टिप्पणी पर फिर मचा बवाल, वकीलों और पूर्व अफसरों ने खोला मोर्चा, पत्र लिखकर जताई भारी नाराजगी

CJI Suryakant की पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर की गई टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिसके विरोध में 70 से अधिक पूर्व नौकरशाहों और वकीलों ने उन्हें एक खुला पत्र लिखकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है।
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जस्टिस सूर्यकांत, फोटो- सोशल मीडिया
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CJI Suryakant Controversial Remarks: भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत एक बार फिर अपनी टिप्पणियों के चलते विवादों के केंद्र में आ गए हैं। 'कॉकरोच विवाद' की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि पर्यावरण से जुड़े एक मामले में उनकी हालिया टिप्पणी ने नया घमासान शुरू कर दिया है।

इस बार देश के 71 रिटायर सिविल सेवकों और वकीलों ने एकजुट होकर चीफ जस्टिस को एक खुला पत्र लिखा है। यह पत्र 'संवैधानिक आचरण समूह' द्वारा जारी किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों पर सख्त आपत्ति जताई गई है।

CJI के तल्ख बयान ने खड़ा किया बड़ा विवाद

विवाद की जड़ जस्टिस सूर्यकांत द्वारा सुनवाई के दौरान की गई वह टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने देश में चल रही विकास परियोजनाओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए थे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा था, "हमें भारत में एक भी ऐसी परियोजना दिखाएं जहां पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हों, 'हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं, देश प्रगति कर रहा है'।" हालांकि यह टिप्पणी लिखित आदेश का हिस्सा नहीं थी, लेकिन इसने न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला गुजरात के पिपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना को दी गई पर्यावरण और तटीय विनियमन क्षेत्र संबंधी स्वीकृतियों से जुड़ा था, जिसे एनजीटी ने बरकरार रखा था।

पूर्व नौकरशाहों ने पत्र में जताई 'पक्षपात और पूर्वाग्रह' की आशंका

चीफ जस्टिस को लिखे गए इस खुले पत्र में हस्ताक्षर करने वालों में दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व विदेश सचिव के रघुनाथ, पूर्व पर्यावरण सचिव मीना गुप्ता और पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर जैसी दिग्गज हस्तियां शामिल हैं। इन पूर्व अधिकारियों का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश की ये टिप्पणियां स्पष्ट रूप से 'पक्षपात और पूर्वाग्रह' को दर्शाती हैं। लेटर में कहा गया है कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था की ओर से इस तरह की बातें आना चिंताजनक है, क्योंकि इससे जनता के बीच गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका की छवि प्रभावित होती है।

आवाज दबाने का लग रहा गंभीर आरोप

रिटायर अफसरों ने अपने लेटर में लिखा है कि इस तरह के बयानों का समाज पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि जब देश की सबसे बड़ी अदालत से ऐसी बातें आती हैं, तो इससे नागरिकों के मन में 'भय' पैदा हो सकता है। यह स्थिति पारिस्थितिक क्षति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और समुदायों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के खिलाफ उठने वाली असहमति की आवाजों को दबा सकती है। पत्र के अनुसार, यह प्रवृत्ति मूल रूप से लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है और नागरिकों को महत्वपूर्ण सवाल पूछने से हतोत्साहित करती है।

कॉकरोच विवाद के बाद CJI की दूसरी बड़ी मुश्किल

आपको बता दें कि कि जस्टिस सूर्यकांत इससे पहले भी अपनी एक टिप्पणी को लेकर विवादों में रह चुके हैं, जहां कथित तौर पर उन पर बेरोजगार युवाओं को 'कॉकरोच' कहने का आरोप लगा था। उस समय उन्हें अपनी टिप्पणी पर सफाई तक देनी पड़ी थी। अब पर्यावरण के मुद्दे पर उनके नए बयान ने आग में घी डालने का काम किया है।

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