सुप्रीम कोर्ट, (सोर्स- सोशल मीडिया)
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से यह जानकारी मांगी कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर कितने मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग ने अब तक नाम हटाने की केवल तीन श्रेणियां बताई हैं- मृत्यु, डुप्लीकेशन और मतदाताओं का स्थानांतरण।
पीठ ने आयोग की ओर से पेश सीनियर वकील राकेश द्विवेदी से सवाल किया कि हम नाम हटाने की प्रक्रिया की जमीनी स्थिति जानना चाहते हैं। क्या संदिग्ध नागरिकता के आधार पर भी नाम हटाने की कोई श्रेणी मौजूद है?
चुनाव आयोग की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने बेंच को बताया कि वह इस मुद्दे पर निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराएंगे। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग केवल मतदाता के रूप में पंजीकरण तक ही नागरिकता से जुड़ा निर्णय कर सकता है। आयोग के पास न तो किसी व्यक्ति को देश से बाहर भेजने का अधिकार है और न ही यह तय करने का अधिकार कि किसी के पास भारत में रहने का वैध वीजा है या नहीं।
याचिकाकर्ता एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि वोट देने के लिए नागरिकता आवश्यक है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के पास नागरिकता तय करने का अधिकार है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से कहा कि केरल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया के बाद प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें सार्वजनिक किया जाए, ताकि प्रभावित मतदाता आपत्ति दर्ज करा सकें। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आयोग से यह भी कहा कि नाम हटाने के खिलाफ आपत्ति दर्ज करने की समय-सीमा को विशेष रूप से दो सप्ताह के लिए बढ़ाने पर विचार किया जाए।
यह भी पढ़ें- SIR को लेकर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, पश्चिम बंगाल-राजस्थान समेत 5 राज्यों के लिए आया नया अपडेट
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि डेडलाइन बढ़ाने के मुद्दे पर विचार किया जाएगा। यह पीठ केरल में किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी।