SUPREME COURT OF INDIA (IMAGE SOURCE- IANS)
SC Notice To Tushar Mehta: आज के समय में एआई यानी आर्टिफिशियल इंडेलिजेंस काफी महत्वपूर्ण हो चुका है। हर वर्ग, हर उम्र के लोग इससे प्रभावित होने लगे हैं। सभी क्षेत्रों में यह कारगर साबित हुआ है लेकिन एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए एआई के दुरुपयोग पर अदालतों को चेतावनी दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अदालत का फैसला एआई से तैयार फर्जी या अस्तित्वहीन निर्णयों पर आधारित पाया गया तो यह सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि गंभीर दुराचार माना जाएगा। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने ऐसे मामलों में सख्त कानूनी परिणामों की चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है।
दरअसल, यह मुद्दा तब समय सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट एक विशेष अनुमति याचिका (स्पेशल लीव पिटीशन) पर सुनवाई कर रहा था, इस पिटीशन ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक मामला एक सिविल सूट से जुड़ा हुआ था, जिसमें विवादित प्रॉपर्टी पर इंजंक्शन की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुद्दा केवल फैसले के गुण-दोष का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और संस्थागत अखंडता से जुड़ी गंभीर चिंता का है।
ट्रायल कोर्ट ने संपत्ति की स्थिति दर्ज करने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था। याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां अगस्त 2025 में खारिज करते हुए अदालत ने कुछ निर्णयों का हवाला दिया। बाद में याचिकाकर्ताओं ने यह दावा किया कि जिन फैसलों का हवाला दिया गया वह फैसले वास्तविक नहीं बल्कि एआई टूल्स से जनरेटेड थे।
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सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान में रखा कि हाईकोर्ट ने चेतावनी दर्ज करते हुए सिविल रिवीजन याचिका खारिज की और ट्रायल कोर्ट का आदेश गुण-दोष के आधार पर बरकरार रखा। जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम में विशेष अनुमति याचिका दायर की। शीर्ष अदालत ने नोटिस जारी कर ट्रायल कोर्ट को एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट पर आगे कार्रवाई से रोका और मामला 10 मार्च 2026 के लिए सूचीबद्ध किया।