

Election Commission SIR: इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के बारे में खुलासे के बाद राजनीतिक हंगामा मच गया है। इस बीच, चुनाव आयोग के सूत्रों का दावा है कि सभी फैसले, जिनमें 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) भी शामिल है उसे सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए थे।
अधिकारियों ने बताया कि हालांकि चुनाव आयुक्तों ने कुछ मुद्दे उठाए थे, लेकिन SIR से जुड़े फैसलों पर आयोग पूरी तरह सहमत था। अधिकारियों ने बुधवार को बताया कि वोटर लिस्ट को ठीक करने की प्रक्रिया के दौरान, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मुद्दे उठाए थे।
इनमें कुछ राज्यों में नाम हटाना भी शामिल था, लेकिन देश भर में वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) से जुड़े फैसलों पर आयोग की पूरी सहमति थी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई मामलों पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने 10 महीनों की अवधि में 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं थी।
ECE के एक सूत्र के अनुसार, "भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।"
विपक्षी दलों ने ECE के खिलाफ नया मोर्चा खोलते हुए आरोप लगाया है कि SIR की प्रक्रिया एक सोची-समझी चाल है, जिससे मतदाता सूची से लोगों के नाम हट सकते हैं और इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।
इस मामले पर राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा, "शुरू में सिर्फ एक चुनाव आयुक्त होता था, लेकिन बाद में संविधान संशोधन या कानून में बदलाव के जरिए, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव से जुड़े मामलों पर फैसला लेने के लिए तीन चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था की गई। और यह तय हुआ कि चुनाव आयोग के फैसले बहुमत से लिए जाएंगे। अब जो बात सामने आई है, वह यह है कि 25 जून 2025 के बाद लिए गए ज्यादातर फैसले बहुमत से नहीं लिए गए; बल्कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों - श्री जोशी और श्री संधू - की आपत्तियों के बावजूद ऐसा किया गया।"
कपिल सिब्बल ने आगे कहा, "मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी दो सदस्यों से सलाह-मशविरा किए बिना अपनी मनमर्जी से काम कर रहे थे, जो खुद चुनाव आयोग के नियमों के खिलाफ है। और इनमें से कई फैसलों का नतीजा आखिरकार चुनाव प्रक्रिया में हेरफेर के तौर पर निकला, जिसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्रवाई को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।"
कपिल सिब्बल ने बताया कि अगर चुनाव आयोग बहुमत से फैसले नहीं लेता है, तो वह आयोग का फैसला नहीं माना जाएगा। इसलिए, आयोग ने अब तक बहुमत की सहमति के बिना जो भी फैसले लिए हैं, उन्हें अमान्य और रद्द घोषित किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग के बड़े फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों वाले पैनल द्वारा लिए जाते हैं। इनमें से दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां जताई थीं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया और फैसलों को बहुमत के आधार पर वोटिंग के लिए आयोग के सामने नहीं रखा गया।
सूत्रों के अनुसार, ECE के सभी फैसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के हस्ताक्षर होते हैं। चुनाव आयोग के नियमों में एक प्रावधान है जिसके तहत, अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त किसी मामले पर सहमत होते हैं, तो बहुमत वाला फैसला ही मान्य होता है।