Explainer: 10 साल में 152 पेपर लीक, 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित; राहुल गांधी के दावे में कितनी सच्चाई?

Rahul Gandhi on Paper Leak: राहुल गांधी ने सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को सुरक्षित रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि हर महीने लगभग एक पेपर लीक होता है। लेकिन दावे का असली सच क्या है?
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी, (सोर्स- X/@RahulGandhi)
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Rahul Gandhi Allegation of 152 Paper Leak: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को आरोप लगाया कि बार-बार एग्जाम पेपर लीक होने से भारत का एजुकेशन सिस्टम सिस्टमैटिक तरीके से कमजोर हो गया है। उन्होंने दावा किया कि पिछले दस सालों में हर महीने लगभग एक पेपर लीक हुआ है, जिससे लगभग 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित हुए हैं। कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि पेपर लीक मामले में आज तक किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया।

देश की राजधानी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेता ने कहा कि बार-बार पेपर लीक होना देश भर में छात्रों के प्रदर्शन के पीछे एक मुख्य कारण है। राहुल गांधी ने सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को सुरक्षित रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि हर महीने लगभग एक पेपर लीक होता है, जिससे 7.5 करोड़ छात्रों पर असर पड़ा है।

10 साल में 152 पेपर लीक का दावा

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर हमला बोलता हुए नेता विपक्ष ने कहा कि पिछले दस सालों में एक भी लोगों को सजा नहीं हुई है। कुछ लोग हमारे शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं। यही वजह है कि हमारे युवा प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हैं। यह सिस्टम महंगा है, सिर्फ धांधली वाला नहीं है। राहुल गांधी ने आगे दावा किया कि पिछले दस सालों में कम से कम 152 पेपर लीक हुए हैं, और इस आंकड़े को एक अनुमान के तौर पर बताया।

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि छात्र बाहर भाग रहे थे। मैं यह सही नहीं कह रहा हूं। यह सबूत है। यह एक ऊपरी सबूत है क्योंकि हमें असल में सही नंबर नहीं पता। लेकिन हम यह जानते हैं कि पिछले दस सालों में 152 पेपर लीक हुए हैं।

राहुल गांधी के दावे का आधार क्या?

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का यह आंकड़ा मुख्य रूप से केंद्रीय (जैसे NEET, UGC-NET, SSC) और विभिन्न राज्य स्तरीय (जैसे यूपी पुलिस भर्ती, राजस्थान REET, मध्य प्रदेश पटवारी भर्ती, बिहार शिक्षक भर्ती आदि) परीक्षाओं में पिछले एक दशक में आई अनियमितताओं, रद्द की गई परीक्षाओं और जांच के दायरे में आए मामलों के संकलन पर आधारित है।

राहुल गांधी के दावे के अनुसार, 10 साल (120 महीने) में 152 पेपर लीक का मतलब है कि औसतन हर महीने लगभग एक परीक्षा का पेपर लीक हुआ या प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इस आंकड़े में केंद्र सरकार की राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों (चाहे वहां बीजेपी की सरकार रही हो या गैर-बीजेपी दलों की) के राज्य सेवा आयोगों और भर्ती बोर्डों की परीक्षाएं शामिल हैं।

राहुल के दावे पर भाजपा का जवाब

राहुल गांधी के इस आंकड़े पर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की तरफ से आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने राहुल गांधी के 152 पेपर लीक के दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार इन सभी आंकड़ों और दावों की समीक्षा व जांच कर रही है और तथ्यात्मक रूप से संसद व जनता के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ जवाब रखेगी। सरकार और बीजेपी का तर्क है कि राहुल गांधी पेपर लीक के मुद्दे पर सेलेक्टिव राजनीति कर रहे हैं।

सरकार ने कहा कि तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, झारखंड, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे गैर-बीजेपी राज्यों में भी परीक्षाओं के पेपर लीक हो रही हैं। सरकार का यह भी कहना है कि परीक्षा प्रणालियों में पारदर्शिता लाने के लिए ही केंद्र सरकार ने 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' लागू किया है, जिसमें पेपर लीक माफियाओं के खिलाफ 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का कड़ा प्रावधान किया गया है।

राहुल गांधी के दावे कितने सच?

राहुल गांधी द्वारा 152 पेपर लीक के दावे को जो आंकड़ा है वो किसी एक केंद्रीय बोर्ड का नहीं, बल्कि पिछले 10 वर्षों में देशभर की राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय भर्तियों/प्रवेश परीक्षाओं का है, जहां पेपर लीक, एग्जाम रद्द या धांधली हुआ है। यह सच है कि पेपर लीक मामलों में अंतरराज्यीय गिरोह और कोचिंग माफिया शामिल होते हैं, जिनमें लंबी जांच और कानूनी पेंच कारण मामलों का निपटारा बेहद धीमा रहा है और सजा की दर बहुत कम रही है।

पेपर लीक पर एक्सपर्ट की राय

विशेषज्ञों की माने तो व्यवस्थागत विफलता पेपर लीक केवल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह केंद्र और राज्य दोनों स्तरों की परीक्षा एजेंसियों और आउटसोर्सिंग व्यवस्था की एक गंभीर तकनीकी व सुरक्षात्मक विफलता को दर्शाता है। अगर सरकार या विपक्षी इस समस्या को जड़ से खत्म करना चाहते हैं, तो उन्हें संसद से एक सख्त और प्रभावी व्यवस्था का गठना करना होगा। नहीं तो देश के छात्रों के भविष्य के साथ हमेशा ऐसे ही खिलवाड़ होता रहेगा।

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