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आपातकाल के 48 अध्यादेश, जिसके दम पर इंदिरा ने चलाया देश, संसद पर लगा था ताला

25 जून 1975 को घोषित आपातकाल में लोकतंत्र की अनदेखी हुई। संसद को निष्क्रिय कर 48 अध्यादेश लाए गए, विपक्ष को जेल में डाल दिया गया, और अनुच्छेद 123 के तहत एकतरफा फैसलों से शासन चलाया गया।

  • By अक्षय साहू
Updated On: Jun 25, 2025 | 10:52 AM

इंदिरा गांधी ने आपातकाल में अध्यादेशों के बल चलाया था देश (फोटो- सोशल मीडिया)

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नई दिल्ली: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक काले अध्याय की तरह दर्ज है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी। इसके बाद देश में संविधान तो बना रहा, लेकिन लोकतंत्र का दम घुटने लगा। संसद भंग होने के बाद सरकार ने संसद की भूमिका को लगभग निष्क्रिय कर दिया और महज अध्यादेशों के जरिए शासन चलाया। इस पूरे दौर में कुल 48 अध्यादेश लाए गए, जो यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि कैसे लोकतंत्र को एकतरफा फैसलों की भेंट चढ़ा दिया गया।

लोकतांत्रिक मर्यादा की अनदेखी

आपातकाल के दौरान संसद भंग कर दी गई थी और विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। ऐसे में न तो कोई बहस हो सकी, न ही कोई संसदीय सवाल उठाया जा सका। सरकार ने अध्यादेशों को अपना मुख्य हथियार बना लिया और बार-बार संविधान के अनुच्छेद 123 का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति से अध्यादेश जारी करवाए।

अनुच्छेद 123 के मुताबिक जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है और राष्ट्रपति को यह महसूस होता है कि तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक है, तो वह अध्यादेश जारी कर सकते हैं। आपातकाल के दौरान 48 अध्यादेश लाए गए, इनमें से अधिकांश अध्यादेश मौलिक अधिकारों को सीमित करने, प्रेस पर सेंसरशिप लगाने और सरकारी फैसलों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए लाए गए थे।

जनता की आवाज पर पहरा

अध्यादेशों की आड़ में सरकार ने प्रेस की आजादी को भी बुरी तरह कुचल दिया था। समाचार पत्रों की सामग्री पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। जिन मीडिया संस्थानों ने विरोध जताया, उनके बिजली और टेलीफोन कनेक्शन काट दिए गए। कई पत्रकारों को बिना मुकदमे के जेल भेजा गया। यह सब बिना संसद की मंजूरी के सिर्फ एक हस्ताक्षर से किया जा रहा था।

न्यायपालिका भी बनी निशाना

एक खास अध्यादेश के जरिए यह तय किया गया कि आपातकाल के दौरान लिए गए सरकारी फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। यानी यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन भी हुआ हो, तो वह न्याय के लिए अदालत नहीं जा सकता। यह लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात था।

जनता पार्टी के उदय तक का सफर

इस तानाशाही शैली के शासन के खिलाफ धीरे-धीरे असंतोष पनपने लगा। जेलों में बंद नेताओं की रिहाई और जनता में व्याप्त असंतोष ने 1977 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की हार की भूमिका तैयार की। चुनावों में जनता पार्टी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और लोकतंत्र ने फिर से सांस ली।

आपातकाल की साजिश! इंदिरा के साथ कौन थे वो 8 लोग, रात 12 बजे से पहले क्या हुआ था?

आपातकाल और उसके दौरान लाए गए 48 अध्यादेश लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी हैं कि सत्ता का केंद्रीकरण कितना खतरनाक हो सकता है। आज जबकि लोकतंत्र मजबूत नजर आता है, तब भी यह याद रखना जरूरी है कि संस्थाएं तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक उन्हें सजग और स्वतंत्र रखा जाए।

Ordinances of emergency indira gandhi rule the country

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Published On: Jun 25, 2025 | 07:00 AM

Topics:  

  • Congress
  • Emergency In India
  • Indira Gandhi

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