प्यार, क्रांति और बलिदान की रहस्यमय गाथा, जानें वो कहानी जब नेताजी हार बैठे एक टाइपिस्ट पर दिल
Netaji Subhash Chandra Bose: आजादी से पहले ही हिंदुस्तान की अस्थाई सरकार बनाने वाले ब्रिलियंट लीडर नेताजी की प्रेम और शादी के अनोखी कहानी, कई ऑफरों ठुकराने वाले बोस को कैसे एक खूबसूरती ने किया जादू।
- Written By: सौरभ शर्मा
नेताजी सुभाष चंद्र बोस पत्नी एमिली शेंकल पीछे अमिय बोस दूसरी तस्वीर में पत्नी व बेटी अनीता बोस (फोटो- सोशल मीडिया)
Netaji Subhash Chandra Bose Untold Story: भारत की आजादी की गाथा में कई महानायकों ने अपना योगदान दिया, लेकिन उनमें से सबसे रहस्यमयी और प्रेरक व्यक्तित्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस का है। देश के बच्चों को किताबों में उनके बारे में केवल कुछ ही बातें पढ़ाई जाती हैं, जबकि उनका जीवन अद्भुत साहस, त्याग और रणनीति से भरा पड़ा है। नेताजी न केवल अंग्रेजों को सीधे चुनौती देने वाले नेता थे, बल्कि उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाकर स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार भी स्थापित की थी। उनकी कहानी आज भी अधूरी लगती है।
नेताजी की असल कहानी जितनी प्रेरक है, उतनी ही रहस्यमयी भी। 23 जनवरी 1897 को कटक में जन्मे सुभाष, अपने पिता जानकीनाथ बोस की इच्छा से ICS बने, लेकिन उनका दिल अंग्रेजी नौकरी में नहीं लगा। चित्तरंजन दास से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की राह चुनी और जल्दी ही युवा नेताओं की पहली पसंद बन गए। 1930 के दशक में वे कोलकाता के मेयर चुने गए और कांग्रेस के भीतर एक मुख्य आवाज के रूप में सामने आए।
आजाद हिंद फौज और अस्थायी सरकार की स्थापना
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सुभाष ने अंग्रेजों को मात देने के लिए जापान और जर्मनी से हाथ मिलाया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हॉल में उन्होंने सैनिकों को संबोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। इसके बाद उन्होंने आजाद हिंद फौज के जरिए इम्फाल और कोहिमा जैसी कठिन लड़ाइयों में ब्रिटिश सेना को चुनौती दी। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की, जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस और आयरलैंड सहित 11 देशों ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान-निकोबार द्वीपों को इस सरकार को सौंपा, जिसे नेताजी ने जाकर नया नाम भी दिया। यह वह क्षण था जब पहली बार भारत को विदेशी धरती पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली।
सम्बंधित ख़बरें
17 मई का इतिहास: जब चार्ली चैपलिन की कब्र खोदकर चुराया गया ताबूत, भारत ने जीते 6 गोल्ड; जानिए अनोखी कहानी
16 मई का इतिहास: अमेरिकी वैज्ञानिक क्लोन की स्टेम सेल रिसर्च में बड़ी कामयाबी, 16 मई को हुआ था पहला ऑस्कर
15 मई का इतिहास: फास्ट फूड की दुनिया बदलने से लेकर ‘धक-धक गर्ल’ के जन्म तक, बेहद खास है आज का दिन
सिक्किम के भारत में विलय के 51 साल, राजशाही के अंत से जैविक क्रांति तक, जानें हिमालयी राज्य का गौरवशाली सफर
1944 में कोहिमा की भीषण लड़ाई में जापानी सेना पीछे हटी और यह युद्ध स्वतंत्रता की लड़ाई का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रंगून रेडियो से महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए आशीर्वाद मांगा।
गांधी-नेहरू से मतभेद और नया रास्ता
नेताजी का कांग्रेस और गांधीजी के साथ मतभेद किसी से छिपा नहीं है। 1920 के दशक से ही वे पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर अडिग थे, जबकि गांधीजी धीरे-धीरे कदम बढ़ाना चाहते थे। भगत सिंह की फांसी के समय भी नेताजी ने गांधी से समझौता तोड़ने की अपील की, लेकिन ऐसा न हो सका। यही कारण था कि सुभाष ने अपना अलग रास्ता चुना और आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की राह पर चल पड़े।
नेताजी की पर्सनैलिटी पर जान छिड़कती थी लड़कियां
नेताजी के जीवन का सबसे अनसुना पहलू उनका प्रेम है। 1934 में सुभाषचन्द्र बोस ऑस्ट्रिया में अपना इलाज करा रहे थे। उस समय उन्होंने अपनी जीवनी लिखने के बारे में सोचा। इसके लिए उन्हें टाइपिस्ट की जरूरत थी। वहां रहने वाले उनके एक दोस्त ने इसके लिए एमिली शेंकल को अप्वाइंट करा दिया। इलाज के दौरान वे एमिली शेंकल से मिले और प्रेम फिर परवान चढ़ा। 1942 में दोनों ने हिंदू रीति से विवाह किया। उनकी बेटी अनिता बोस फाफ आज भी पिता की विरासत से जुड़ी हुई हैं। यह प्रेम कहानी नेताजी को और मानवीय बनाती है।
उनकी बेटी अनिता बोस फाफ आज भी जीवित हैं और भारत से गहरा जुड़ाव रखती हैं। बताया जाता है कि नेताजी की पर्सनैलिटी काफी आकर्षक थी, जिस वजह से वह लड़कियाों की बीच काफी चर्चा में रहते थे। तेज दिमाग और अट्रेक्टिव पर्सनैलिटी के चलते लड़कियां उन्हें बहुत पंसद करती थीं। प्रेम की पहल सुभाष चंद्र बोस की ओर से हुई और धीरे-धीरे रिश्ता प्रेमपूर्ण होता गया। 1934 के मध्य से मार्च 1936 तक ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया में प्रवास के दौरान रिश्ते प्रगाड हो गए।
रहस्यमयी मौत और अधूरा सच
18 अगस्त 1945 को नेताजी के विमान दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर आई। टोकियो रेडियो ने घोषणा की कि ताइहोकू एयरपोर्ट के पास विमान हादसे में वे गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में दम तोड़ दिया। कर्नल हबीबुर्रहमान ने दावा किया कि उनका अंतिम संस्कार वहीं हुआ और अस्थियां जापान के रैंकोजी मंदिर में रखी गईं। लेकिन उनके परिवार और कई इतिहासकारों का मानना है कि नेताजी की मौत उस समय नहीं हुई, बल्कि वे रूस में नजरबंद रहे।
2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस रहस्य से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग पर सुनवाई का आदेश दिया, लेकिन आज तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आई। इस कारण नेताजी का जीवन और उनकी मृत्यु भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बनी हुई है।
आजादी के 75 साल बाद भी जिंदा है नेताजी की विरासत
भारत सरकार ने नेताजी की स्मृति में कई कदम उठाए हैं। 2018 में आजाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को उनकी 125वीं जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ घोषित किया गया। 2022 में नई दिल्ली के कर्तव्यपथ पर उनकी विशाल प्रतिमा का अनावरण हुआ।
सुभाष चंद्र बोस केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि वह व्यक्ति थे जिसने भारतवासियों को विश्वास दिलाया कि अंग्रेजों को हराना असंभव नहीं है। उनका नारा जय हिंद आज भी देशभक्ति का सबसे मजबूत प्रतीक है। नेताजी का जीवन हमें सिखाता है कि आजादी की कीमत संघर्ष और बलिदान से ही चुकाई जाती है। अपने जीवनकाल में 11 बार जेल गए नेताजी को अंग्रेज सरकार ने कई बार खतरनाक माना।
यह भी पढ़ें: अंग्रेजों को फारसी सिखाने वाले सरदार अजीत सिंह कहानी, वो क्रांतिकारी जिनके किस्से सीमाएं पार कर गए
एक ऐसा अनकहा सच पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरणादायक और रहस्यमयी गाथा है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा देशभक्त अपने लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए जीता है। उनकी अस्थायी सरकार, आजाद हिंद फौज और त्यागपूर्ण संघर्ष हमें आज भी नई ऊर्जा देते हैं। नेताजी का अनकहा सच पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा और शायद आने वाले समय में उनकी मृत्यु का रहस्य भी उजागर हो पाए।
