महावीर प्रसाद द्विवेदी की एक डांट ने बदल दी मैथिलीशरण गुप्त की पूरी जिंदगी, जानें राष्ट्रकवि बनने की कहानी
Maithilisharan Gupt: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम 'मिथिलाधिप नंदनशरण' से 'मैथिलीशरण' कैसे पड़ा? जानिए महावीर प्रसाद द्विवेदी की डांट से राष्ट्रकवि बनने तक उनके अद्भुत साहित्यिक सफर की पूरी कहानी।
- Written By: अमन मौर्या
मैथिलीशरण गुप्त (सोर्स- सोशल मीडिया)
Maithilisharan Gupt Birth Anniversary: आज के दिन 1886 को उत्तर प्रदेश के झांसी के निकट चिरगांव में जन्मे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के माता-पिता ने बड़े प्यार से उसका नाम ‘मिथिलाधिप नंदनशरण’ रखा, लेकिन जब उस बच्चे को विद्यालय में भर्ती कराने ले जाया गया, तो यह भारी-भरकम नाम स्कूल के उपस्थिति रजिस्टर के छोटे से खाने में समा नहीं सका। विवश होकर शिक्षक ने सुविधा के लिए इसे संक्षिप्त कर ‘मैथिलीशरण’ कर दिया। धनाढ्य गहोई वैश्य परिवार में जन्म लेने के कारण नाम के साथ स्वाभाविक रूप से ‘गुप्त’ जुड़ गया।
पिता से मिला कविता का संस्कार
बचपन में स्कूली शिक्षा में मन न लगने के कारण उनके पिता सेठ रामचरण ने घर पर ही उनके लिए संस्कृत, अंग्रेजी और बंगाली भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था की थी। कविता के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही मिले थे, जो स्वयं ‘कनकलता’ उपनाम से कविताएं लिखते थे। मैथिलीशरण गुप्त बचपन में ‘स्वर्णलता’ और किशोरावस्था में ‘रसिकेश’ तथा ‘रसिकेंदु’ जैसे उपनामों से शृंगारिक कविताएं लिखा करते थे। शृंगारिक कविताएं वे होती हैं जिनमें प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और नायक-नायिका के मिलन या बिछोह का वर्णन होता है।
महावीर प्रसाद की एक डांट ने बदली साहित्यिक दिशा
उनके साहित्यिक जीवन का सबसे रोचक और दिशा-परिवर्तक मोड़ तब आया, जब उन्होंने अपनी शृंगारिक कविताएं ‘रसिक’ उपनाम से तत्कालीन प्रसिद्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका के यशस्वी संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को प्रकाशनार्थ भेजीं।
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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (सोर्स- सोशल मीडिया)
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने न केवल उन कविताओं को छापने से सख्ती से मना कर दिया, बल्कि एक कड़े पत्र में उन्हें खूब डांट लगाई कि ऐसे उथल-पुथल वाले राजनीतिक दौर में समय-विरोधी शृंगारिक रचनाएं लिखना सर्वथा व्यर्थ है। मैथिलीशरण गुप्त ने तत्काल प्रभाव से अपना ‘रसिक’ उपनाम त्याग दिया और महावीर प्रसाद द्विवेदी के कुशल मार्गदर्शन में ब्रजभाषा की पारंपरिक मधुरता को छोड़कर खड़ी बोली की ओर एक युगांतरकारी कदम बढ़ाया।
‘भारत-भारती’ के बाद मिली ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि
उस दौर में जब अधिकांश कवि ब्रजभाषा के मोहपाश में बंधे थे, मैथिलीशरण गुप्त ने अपने अथक प्रयास से खड़ी बोली को एक परिष्कृत और सशक्त काव्य-भाषा के रूप में स्थापित किया। 1912 में जब उनकी कालजयी रचना ‘भारत-भारती’ प्रकाशित हुई, तो उसने परतंत्र भारतीय जनमानस में राष्ट्रीयता की एक नई ज्वाला धधका दी। इस कृति में देश के गौरवशाली अतीत, पतनशील वर्तमान और आशातीत भविष्य का ऐसा मार्मिक चित्रण था कि यह रातों-रात स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक अघोषित घोषणा पत्र बन गई।
महात्मा गांधी ने मैथिलीशरण गुप्त को दी थी राष्ट्रकवि की उपाधि (सोर्स- सोशल मीडिया)
इसी प्रभाव के कारण महात्मा गांधी ने 1936 के आसपास उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की ऐतिहासिक उपाधि से अलंकृत किया। अंग्रेजी सरकार के दमन से बचने के लिए उन्होंने ‘नित्यानंद’ और ‘भारतीय’ जैसे छद्म नामों से भी तीखी राष्ट्रवादी कविताएं लिखीं।
‘साकेत’ के माध्यम से उर्मिला की विरह वेदना को दिया स्वर
उनके महाकाव्य ‘साकेत’ ने भारतीय महाकाव्य परंपरा में सदैव उपेक्षित रही लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की विरह वेदना को एक नया और सशक्त स्वर दिया। इसी तरह अपनी एक अन्य कालजयी रचना ‘यशोधरा’ (1932) में उन्होंने महात्मा बुद्ध की पत्नी की मार्मिक स्थिति को उकेरा।
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राजनीति में भी रहे सक्रिय
वे 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1964 तक राज्यसभा सदस्य रहे और वे अपनी राय और तत्कालीन समस्याओं पर अपनी बात प्रायः काव्यात्मक रूप में ही सदन के सामने रखा करते थे। उन्हें 1954 में साहित्य-शिक्षा में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 12 दिसंबर 1964 को इस महान साहित्यकार ने अपनी अंतिम सांस ली।
