इस मामले में दूसरे राजाओं से काफी अलग थे हरि सिंह, इसीलिए आज भी जम्मू कश्मीर के लोग करते हैं याद
- Written By: साक्षी सिंह
Maharaja Hari Singh Birth Anniversary
स्पेशल स्टोरी डेस्क: आज यानी 23 सितंबर को अंतिम डोगरा शासक और जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह का 127 वीं बर्थ एनवर्सरी है। 1925 में जब हरि सिंह गद्दी पर बैठे तो शुरुआत शानदार थी। वह दूसरे राजाओं से काफी अलग थे। ताजपोशी के बाद जिस तरह की घोषणाएं उन्होंने कीं, उन्हें सचमुच क्रांतिकारी कहा जा सकता है। हालांकि हरि सिंह और डोगरा शासन को लेकर जम्मू और घाटी के लोगों की राय हमेशा अलग-अलग रही है। जहां एक ओर जम्मू के लोगों के लिए डोगरा वंश के अंतिम शासक उनकी खोई हुई आन-बान और शान का प्रतीक मानते हैं, वहीं घाटी के बहुत सारे लोग डोगरा शासकों को उत्पीड़न के प्रतीक यानी निरंकुश शासक के तौर पर देखते हैं।
डोगरा संगठनों की लंबे समय से थी ये मांग
जम्मू कश्मीर के लेफ्टिनेंट मनोज सिन्हा ने उन्हें ‘महान शिक्षाविद, प्रगतिशील विचारक, समाज सुधारक और आदर्शों से युक्त शीर्ष व्यक्तित्व कहा है। डोगरा संगठनों की लंबे समय से मांग थी महाराजा हरि सिंह की जयंती पर जम्मू-कश्मीर में अवकाश घोषित किया जाए जो कि पिछले साल मान्य कर दिया गया।
सम्बंधित ख़बरें
Kal Ka Mausam: इन राज्यों में होगी मूसलाधार बारिश, मौसम विभाग ने जारी किया बड़ा अलर्ट, पढ़ें IMD का ताजा अपडेट
Taapsee Pannu Fitness: जीरो फिगर की दौड़ पर तापसी पन्नू की सलाह, बोलीं- खराब फिटनेस की निशानी नहीं है बेली फैट
अभी न करें बुवाई, धैर्य रखें किसान; महाराष्ट्र मुख्यमंत्री कार्यालय ने जारी की किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी
आस्था के आगे मौसम फेल, गजेंद्र चौहान पहुंचे बाबा महाकाल के द्वार; कहा बड़ रही शिव से जुड़े गीतों की लोकप्रियता
शासन में जनभागीदारी सुनिश्चित करने की नींव
जम्मू कश्मीर में शासन में जनभागीदारी सुनिश्चित करने की नींव जम्मू कश्मीर के अंतिम डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह ने रखी थी। उन्होंने ही पंचायती राज अधिनियम बनाया था और उन्होंने ही यहां प्रजा सभा बनाई थी, जिसमें जनता के चुने हुए प्रतिनिधि शामिल होते थे। जम्मू कश्मीर में पंचायत राज अधिनियम 1935 में लागू हुआ था। इससे पहले 1934 में महाराजा हरि सिंह ने प्रशासकीय कामकाज में पारदर्शिता लाने और आम लोगों की विकास व नीतिगत मामलों में भागदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रजा सभा गठित की थी। प्रजा सभा का पहला चुनाव 1934 में हुआ था।
प्रजा सभा के गठन और संविधान की तैयारी
जम्मू कश्मीर मामलों के जानकार प्रो. हरि ओम ने एक मीडिया चैनल को बताया कि प्रजा सभा के गठन और संविधान को तैयार करने की जिम्मेदारी महाराजा हरि सिंह ने 1932 में सर बरजोर दलाल को सौंप था। उन्होंने 1933 में अपनी सिफारिशें महाराजा हरि सिंह को सौंपी थी। प्रजा परिषद में 75 सदस्य होते थे।
हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदाय के भी प्रजा परिषद होते थे
प्रजा परिषद में 12 सरकारी अधिकारी, 16 स्टेट काउंसलर और 14 नामांकित प्रतिनिधियों के अलावा 33 जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते थे। निर्वाचित प्रतिनिधियों में 21 मुस्लिम, 10 हिंदू और दो सिख समुदाय से होते थे। उन्होंने बताया कि प्रजा सभा के पहले चुनाव में आल जम्मू कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेन्स जो बाद में नेशनल कान्फ्रेन्स बनी, ने शेख मेाहम्मद अब्दुल्ला के नेतृत्व में भगा लिया। मुस्लिम कान्फ्रेन्स के 16 उम्मीदवार चुनाव जीते थे।
सेनापति गुलाब सिंह ने ऐसा पलटा समीकरण
1846 में सोबरांव के ब्रिटिश-सिख युद्ध में पंजाब की महारानी ने गुलाब सिंह को सेनापति नियुक्त किया था, लेकिन युद्ध से अलग रहकर उन्होंने अंग्रेजों की मदद की, इसके बाद ‘अमृतसर संधि’ में 75 लाख नानकशाही रुपए देकर उन्होंने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर शासन करने का एकाधिकार हासिल किया था, इस समझौते को घाटी में अक्सर ‘अमृतसर बैनामा’ के नाम से जाना जाता है।
इसके पहले के इतिहास में कश्मीर घाटी का असर अधिक रहा था और जम्मू के राजा या तो घाटी के अधीन रहे थे या फिर उनको नजराना देते रहे थे। जम्मू के राजा गुलाब सिंह के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के महाराजा बनने के साथ ही यह समीकरण पलट गया था। शासन में आने के बाद गुलाब सिंह की नीतियों ने इस वर्चस्व को जिस तरह से स्थापित किया उसने घाटी के मुसलमानों में पराधीनता का भाव हुआ।
दूसरे राजाओं से अलग थे हरि सिंह
1925 में जब हरि सिंह गद्दी पर बैठे तो शुरुआत शानदार थी। ताजपोशी के बाद जिस तरह की घोषणाएं उन्होंने कीं, उन्हें सचमुच क्रांतिकारी कहा जा सकता है। ‘द ट्रेजेडी ऑफ कश्मीर’ में इतिहासकार एचएल सक्सेना बताते हैं कि अपने पहले संबोधन में महाराजा हरि सिंह ने कहा था कि मैं एक हिन्दू हूँ लेकिन अपनी जनता के शासक के रूप में मेरा एक ही धर्म है-न्याय। वह ईद के आयोजनों में भी शामिल हुए और 1928 में जब श्रीनगर शहर बाढ़ में डूब गया तो वह खुद दौरे पर निकले।
राजतिलक समारोह में हरि सिंह की आधुनिक घोषणाएं
हरि सिंह ने राजतिलक समारोह में उन्होंने जो घोषणाएं की थीं वे आधुनिकीकरण की ओर बढ़ाए गए कदम थे। मसलन, उनमें जम्मू, और कश्मीर घाटी में 50-50 तथा गिलगित और लद्दाख में 10-10 स्कूल खोलने का ऐलान किया, और उनके निर्माण के लिए लकड़ी वन विभाग से मुफ़्त दिए जाने की घोषणा की।
जम्मू और घाटी में तीन-तीन मोबाइल डिस्पेंसरियां खोलना, तकनीकी शिक्षा का विस्तार करना, श्रीनगर में एक अस्पताल खोलना, पीने के पानी की व्यवस्था करना उनके कई बड़े क़दमों में शामिल थे। उन्होंने लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 वर्ष कर दिया, इसके साथ ही, उन्होंने बच्चों के टीकाकरण का इंतजाम भी कराया।
बच्चों और किसानों के लिए अहम फैसले
किसानों की हालत सुधारने के लिए ‘कृषि राहत अधिनियम’ बनाया जिसने किसानों को महाजनों के चंगुल से छुड़ाने में मदद की. शैक्षणिक रूप से अत्यंत पिछड़े राज्य में उन्होंने अनिवार्य शिक्षा के लिए नियम बना।, सभी के लिए बच्चों को स्कूल भेजना जरूरी बना दिया गया। इसीलिए इन स्कूलों को लोग ‘जबरी स्कूल’ भी कहने लगे।
जब राज्य के सभी मंदिरों को दलितों के लिए खोल दिए गए
इन सबके अलावा सबसे क्रांतिकारी घोषणा तो उन्होंने अक्टूबर 1932 में की जब राज्य के सभी मंदिरों को दलितों के लिए खोल दिया। यह घोषणा गाँधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन से भी पहले हुई थी और शायद देश में पहली ऐसी कोशिश थी। कोल्हापुर के शाहूजी महाराज के अलावा इस तर्ज पर सोचने वाला राजा उस दौर में शायद ही कोई और था। यह इतना क्रांतिकारी निर्णय था कि रघुनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया था।
चमचागिरि के खिलाफ थे महाराजा हरि सिंह
जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्री रहे जॉर्ज एडर्वड वेकफील्ड के हवाले से एमवाइ सर्राफ ने अपनी किताब ‘कश्मीरी फाइट्स फॉर फ्रीडम’ में बताते हैं कि अपने शासन के शुरुआती दौर में वह चमचागिरी के इतने खिलाफ थे कि उन्होंने एक सालाना ख़िताब देना तय किया था, जिसका नाम ‘खुशामदी टट्टू’ अवार्ड था, जिसके तहत बंद दरबार में हर साल सबसे बड़े चमचे को टट्टू की प्रतिमा दी जाती थी।
शानदार शुरुआत के बाद भटके हरि सिंह के कदम
तीस के दशक में जब आंदोलन तेज हुआ तो हरि सिंह ने भी वही नीतियां अपनाई जो कोई भी निरंकुश राजा अपनाता है। इसके पहले गोलमेज कांफ्रेंस में इस युवा महाराजा ने जिस तरह भारतीयों के लिए ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस में बराबरी के अधिकार की मांग उठाई थी और राजाओं को एक ऑल इंडिया फेडरेशन में शामिल होने की अपील की थी उससे ब्रिटिश सरकार भी नाखुश थी।
कश्मीर घाटी में ऐसे भड़का असंतोष
गिलगित के नियंत्रण को लेकर भी महाराजा का रवैया अंग्रेजी सरकार को मुश्किल में डालने वाला था, इसी वजह से जब कश्मीर घाटी में असंतोष भड़का तो महाराजा की मदद करने की जगह, ब्रिटिश हुकूमत ने खुद को मुसलमानों के खैरख्वाह के रूप में पेश किया और मौके का फायदा उठाकर न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री हरिकृष्ण कौल की जगह एक ब्रिटिश अधिकारी कैल्विन को कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त करवाया बल्कि राज्य के तीन प्रमुख मंत्रालय-गृह, राजस्व और पुलिस भी ब्रिटिश आईसीएस अधिकारियों को सौंप दिए। हालात ऐसे बने कि महाराजा ने गिलगित का नियंत्रण साठ साल की लीज़ पर अंग्रेजों को सौंप दिया जबकि गिलगित स्काउट का वेतन महाराजा के खजाने से ही दिया जाता रहा।
हरि सिंह की घटती लोक प्रियता
ऐसे में कश्मीर में हरि सिंह ने न केवल अपनी लोकप्रियता खोई बल्कि लगातार उनकी प्रशासनिक क्षमता को चुनौतियां मिलती रहीं। 1930 के दशक की मंदी से तबाह कश्मीरी उद्योगों को वह कभी संभाल नहीं पाए और आय का एक बड़ा स्रोत शॉल का उद्योग उजड़ गया। 1946 में जब शेख अब्दुल्लाह ने भारत छोड़ो की तर्ज पर कश्मीर छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो यह टकराव चरम पर पहुंच गया। ‘अमृतसर बैनामा तोड़ दो-कश्मीर हमारा छोड़ दो’ का नारा महाराजा के लिए बर्दाश्त के काबिल कैसे हो सकता था?
भारत के आजादी के बाद महाराजा हरि सिंह
भारत 15 अगस्त 1947 को जब आजाद हुआ तो उसके साथ पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर भी आजाद हो गए। अब हरि सिंह को अंग्रेज नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान से डील करना था। उन्होंने एक रास्ता निकाला ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ का, यानी जो जैसा है, वैसा बना रहे।
जिन्ना के लिए मुस्लिम-बहुल कश्मीर का पाकिस्तान में विलय प्रतिष्ठा का सवाल था। ‘स्टैंड स्टिल’ समझौते का फयदा उठाकर पहले नाकाबंदी की गई और फिर क़बायलियों की आड़ में पाकिस्तानी सेना भेज दी गई जिनका मकसद कश्मीर पर कब्जा करना था।
सैन्य प्रशिक्षित महाराजा युद्ध से पीछे नहीं हटे लेकिन जल्द ही समझ गए कि कश्मीर की सीमित सेना से पाकिस्तान का मुक़ाबला करना संभव नहीं है। अब दो ही रास्ते थे उनके पास- भारत से सहायता मांगना या फिर पाकिस्तान के सामने समर्पण कर देना।
आजादी के दो महीने के भारत के विलयपत्र पर हस्ताक्षर
भारत बिना विलय के सहायता भेजने को राजी नहीं था तो 26 अक्टूबर 1947 को दो महीने की आजादी के बाद महाराजा हरि सिंह ने आखिरकार भारत के साथ विलयपत्र पर हस्ताक्षर कर ही दिया। आजाद डोगरिस्तान का उनका सपना हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया। डोगरा वंश के आखिरी शासक का यह कश्मीर में आखिरी दिन था। 26 अक्टूबर को वह श्रीनगर से जम्मू आ गए।
सत्ता से बेदखल के बाद हरि सिंह बम्बई चले गए
इस तरह 1846 में गुलाब सिंह के जम्मू से श्रीनगर जाने के साथ हुआ डोगरा वंश का सफर इस वापसी के साथ अपने अंतिम पड़ाव पर पहुच गया। वह फिर कभी लौटकर श्रीनगर नहीं गए और जब 20 जून 1949 को उन्हें सत्ता से औपचारिक रूप से बेदखल कर दिया गया तो वह बम्बई चले गए जहां उनके ढेरों यार-दोस्त और पसंदीदा रेसकोर्स था।
कर्ण सिंह ने अपने आत्मकथा में लिखी महाराज की दुविधाएं
कर्ण सिंह ने अपने पिता महाराजा हरि सिंह के बारे में एक दिलचस्प टिप्पणी की है जो महाराजा की दुविधाओं को दिखाती है। वे अपनी आत्मकथा ‘हेयर एपरेन्ट’ में लिखते हैं- उस समय भारत में चार प्रमुख ताकतें थीं और मेरे पिता के सम्बन्ध उन सबसे दुश्मनी के थे। एक तरफ ब्रिटिश थे, लेकिन वे यानी की हरि सिंह इतने देशभक्त थे कि अंग्रेजों से कोई गुप्त सौदेबाजी नहीं कर सकते थे।
दूसरी तरफ, कांग्रेस थी जिससे मेरे पिता के बैर की प्रमुख वजह जवाहरलाल नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला की करीबी थी। फिर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली इन्डियन मुस्लिम लीग थी। हालांकि लीग ने रजवाड़ों के निर्णय के अधिकार का समर्थन किया था लेकिन मेरे पिता इतने हिन्दू थे कि लीग के आक्रामक मुस्लिम साम्प्रदायिक रुख को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे, और अंत में शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस थी जिससे मेरे पिता के रिश्ते दशकों से शत्रुतापूर्ण थे क्योंकि वह उन्हें अपनी सत्ता और डोगरा शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे।
नतीजतन, जब फैसले का वक्त आया तो सभी असरदार ताकते उनके विरोध में थीं। यही वे ऐतिहासिक परिस्थितियां थीं जिनमें हरि सिंह अपनी तमाम प्रगतिशीलताओं के बावजूद इतिहास के नेपथ्य में चले गए और 26 अप्रैल 1961 को बंबई में उनकी लगभग गुमनाम मृत्यु हुई।
